HomeBuddha Dhammaमहासिद्ध चमारिपा: चमार समाज की बौद्ध धरोहर व गौरवशाली इतिहास

महासिद्ध चमारिपा: चमार समाज की बौद्ध धरोहर व गौरवशाली इतिहास

बाबासाहब आंबेडकर ने अपने ग्रंथ अछूत कौन थे को नंदनार, चोखामेंळा, और रैदास को समर्पित किया. इस ग्रंथ यह प्रमाणित करता है की अछूत समाज की उत्पत्ति ब्राम्हण और बौद्धधर्म के संघर्ष में है. बाबासाहेब ने सप्रमाण इस बात को सिद्ध किया है. खोजबीन करने के बाद यह बात ज्ञात होती है की चमार समाज का एक बडा इतिहास है. चमार समाज समूचे भारत में रहता है और जनसंख्या में इसकी आबादी बहुत ज्यादा है. एक राजनैतिक शक्ती इस समाज में जागृत होती है तो बहुत बडी क्रांति पूरे क्रांति का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता चमार समाज में है.

जो समाज इतिहास को भुला देता है, वह समाज इतिहास रच नहीं सकता. चमार समाज के सबसे बडे संत शिरोमणी रैदास साहब को जानना जरुरी है. साहब रैदास एक निर्गुण पंरपरा के संत थे, जिनकी वाणी ने केवल चमार समाज के लिए ही नहीं, समूचे भारत के लोगों के लिए निर्वाण के द्वार खोल दिए. उनकी गुरुबाणी में वह ताकत हैं की हमारे समाज को वह गहरी निंद से जगा सकते है. लेकिन हम साहब रैदास को बिना बौद्ध धर्म के संदर्भ से गहराई से नहीं समझ सकते. साहब रैदास का इस प्रकार ब्राम्हणीकरण किया गया की अधिकांश लोग उन्हें हिन्दु मानते है. लेकिन यह बात झूठी है. साहिब रैदास ने हर इन्सान के अंदर बसे हूए सत्य से जागृत होने कि बात कहीं है. जातिवाद पर घणाघात कर, समता की शिक्षा देते हुए, एक नव समाज की बात की है. साहब रैदास निर्गुण संत परंपरा से है जिस की जडे बौद्ध परंपरा के नाथ सिद्ध परंपरा से है.

Maha Siddha Chamaripa
Mahasiddha Chamaripa: महान सिद्ध चम्पारिपा की ग्राफिक फोटो

साहिब रैदास से पूर्व चमार समाज में एक बौद्ध सिद्ध का जन्म हुआ, इस बात का ठोस प्रमाण हमें बौद्ध साहित्य में मिलता हैं. इस महासिद्ध का नाम था चमारिपा.

पाल शासकों के समय एक अदभुत विचार प्रणाली का जन्म भारत के बौद्धधर्म में हुआ जिस ने पूरे विश्व को फिर से एकबार हर इंसान के भीतर बसे हुए बुद्ध को जागृत करने की और इसी जन्म में निर्वाण प्राप्त करने की प्रणाली निर्माण की जिसे तंत्रयान कहते है. इस विचार प्रणाली के बहुत सारे दस्तावेज भारत से लुप्त हूए लेकिन यह विचार आज भी संत शिक्षा में जीवित है. यह मुक्ती का तंत्र हमें आज भी निर्गुण संतों में, जिस में साहिब रैदास और कबीर शामिल है, मौजूद दिखता हैं.

बौद्ध विद्वान अभयदत्त लिखित चतुराशीती सिद्ध प्रवक्ती नामक ग्रंथ में चौरासी महासिद्धोकी जीवनावली है. यह ग्रंथ भारत से लुप्त हुआ, लेकिन तिब्बती भाषा में यह ग्रंथ मौजूद है. यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है की, बहुत सारे महासिद्ध अब्राम्हणी समाज से आते थे और ज्यादातर बहुजन समाज से थे. यह ग्रंथ यह भी प्रमाणित करता है की बौद्धधर्म बहुजन समाज की धरोवर का हिस्सा है. इस ग्रंथ में चमारिपा महासिद्ध की संक्षिप्त जीवनी है. कुछ पाठक जानते होंगे की तिब्बती परंपरा में मारपा और मिलारेपा इसी सिद्धोंके परंपरा से आते है. मच्छेन्द और उनके शिष्य गोरख भी बौद्ध के महासिद्ध है इस का प्रमाण इस ग्रंथ में है.

सदगुरू चमारिपा का जन्म विष्णुनगर शहर में हुआ था. वह जूते बनाने का काम करते थे. चमार समाज के सभी लोग चर्मकारी काम नहीं करते थे, रामनारायण रावत ने अपने संशोधन में यह सिद्ध किया हैं की अधिकांश चमार खेती का काम करते हैं. लेकिन मृत प्राणीके संपर्क में उन्हें चर्मकारी कि कला ज्ञात थी, और उनकी श्रेष्ठ कारागारीसे वह चमडे से जुते बना सकते थे. सिद्ध चमारिपा इस कला के स्वामी थे, नये पूराने जूतों का व्यापार करते थे. दिन रात काम करके वह परेशान हो गये, लेकिन एक दिन उनकी मुलाकात एक बौद्ध योगी से हुई. चमारिपा ने उस कल्याण मिंत्र से बुद्ध की शिक्षा ग्रहण कर बारह साल साधना कर निर्वाण को अनुभवीत कर हजारों लोगोंको बौद्धधर्म सिखाया.

उनकी साधना चर्मकारी से जुडी थी, इसका वर्णन इस प्रकार है:

मनके प्रपंच और विकारोंको चमडा समझकर
मैत्री और करुणा के साधनों पे
गुरू के शब्दोंसे भेदकर
एक सुत्र में सिलाकर
आठ लोकस्वभाव छोड दो।

अपने आप एक जुता प्रगट होगा।
यह धर्मकाया का विलक्षण जुता,
तब ही प्रगट होगा,
जब मिच्छा दृष्टी का त्याग होगा।

इसका अर्थ यह भी होता है की –

चाह अचाह में
निरती की डोर बांध के परित्याग करना।
सभी मनके प्रपंच चमडा है
यह मान के,
धर्मकाया रूपी जुते पर ध्यान लगाना,
अपने अनुभव के आधार पर और गुरबानी से
यह धर्मकाया जुता बनाना।

बारा साल साधना कर चमारिपा महासिद्ध ने अपने आत्मबुद्ध को जगाया और बुद्धत्व की प्राप्तिकर हजारों लोगोंको प्रेरित किया.

इसी परंपरा से बाद में सहजशुन्यवादी निर्गुणी संत शिरोमणी रैदास और कबीर पैदा हुए, और सर्व समाज को बुद्ध तत्वों से अवगत कराया.

इसी परंपरा को बाबासाहब ने पुनरुज्जीवित कर बौद्धधर्म का निशान लहराया।

(लेखक : मंगेश दहिवले)

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