HomeBuddha Dhammaबाबाओं का सम्मोहन असली समस्या है

बाबाओं का सम्मोहन असली समस्या है

अक्सर ओशो रजनीश या अन्य बाबाओं और कथाकारों के प्रवचनों में से कुछ प्रगतिशील और क्रांतिकारी बातें चुनकर प्रचारित की जाती रही हैं और ये आभास दिया जाता है कि ओशो या अन्य बाबा लोग प्रगतिशील हैं.

ये भी आभास कराया जाता है कि ये लोग अंधविश्वास, भूत प्रेत या देवी देवता या ज्योतिष आदि के खिलाफ हैं. लेकिन हकीकत में ये बहुत चालाक होते हैं और अंधविश्वास के आधार पर ही अपना कारोबार चलाते हैं. ये दूसरों को शारीरिक मानसिक कष्ट से छुटकारा दिलाने के लिए चमत्कार दिव्य शक्ति आदि के खेल दिखाते हैं लेकिन खुद अपने के लिए बेहतर से बेहतर कारें, अस्पताल, खेल खिलौने और दैनिक उपभोग के सारे भौतिक सामान इकट्ठे करते हैं.

एक ख़ास तरह की पश्चिमी आधुनिकता का जब तब बखान करते हुए ये प्रगतिशील बनने का ढोंग भी करते हैं. विज्ञान की खोजों की बात करते हैं. आधुनिक लेखकों और बुद्धिजीवियों के काम को पढकर उन्हें दोहराकर भोली-भाली जनता को प्रभावित करके आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म आदि का जहर फैलाते हैं.

आधुनिक नजर आने के लिए ऊपर-ऊपर ये लोग आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की जहरीली त्रिमूर्ति से दूरी बनाते हैं. कई बार ये बाबा लोग इंसानियत प्रेम और स्वतन्त्रता की भी तारीफ़ करते नजर आते हैं लेकिन ये सब चालबाजियां हैं. कभी-कभी ये वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था और स्री् शोषण के खिलाफ भी बड़े दिव्य प्रवचन देते हैं लेकिन याद रखिये ये इनकी मूल शिक्षा नहीं है.

ये देखना जरुरी है कि जिन्दगी भर ओशो और उनके जैसे बाबा लोग क्या सिखा रहे हैं? वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था सहित स्त्रीयों के शोषण की सारी यांत्रिकी जिस आत्मा इश्वर और पुनर्जन्म के सिद्धांत के आधार पर बनी है उसी की वे जीवन भर शिक्षा दे रहे हैं. क्या ये पाखंड नहीं है? ये भारत की गरीब और शोषित जनता के साथ भारी धोखा नहीं है?

भारत में वर्ण और जाति सहित शोषण के अन्य तन्त्र कैसे काम करते हैं इस पर थोड़ा अध्ययन कीजिएगा. आप देख सकेंगे कि सनातन आत्मा का सिद्धांत ही असली जहर है जिसे श्रमणों, चार्वाकों और लोकायत दर्शन मानने वालों ने या जैनों ने या बुद्ध और बौद्ध परम्परा ने खत्म करने की कोशिश की थी लेकिन ओशो जैसे आचार्यों ने हर दौर में स्वयं बुद्ध महावीर और कबीर आदि के मुंह से ही आत्मा और वेदान्त बुलवा लिया. ये बुद्ध महावीर और कबीर के खिलाफ सबसे बड़ा और सबसे पुराना षड्यंत्र है.

ओशो और भारत के अन्य वेदांती बाबा न तो बुद्ध को समझते हैं न ही उन्हें प्रेम करते हैं, वे बुद्ध का नाम लेकर या महावीर या कबीर का नाम लेकर सिर्फ प्रगतिशील नजर आने का षड्यंत्र रचते हैं. दुनिया में बुद्ध की महिमा ओशो से या थियोसोफिकल सोसाइटी से भी बहुत पहले ही स्थापित हो चुकी थी, ओशो उस महिमा का मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के तौर पर इस्तेमाल भर करते रहे हैं.

जैसे भारत के सभी अवसरवादी राजनेता करते हैं, भारत के भीतर वे तीर तलवार वाले देवताओं और तुलसीदास की स्तुति करते हैं और यूरोप अमेरिका में अचानक बुद्ध और कबीर की प्रशंसा करने लगते हैं. ये शुद्धतम राजनीतिक पाखंड है. इससे भारत के समाज का बहुत नुक्सान किया जा रहा है. अध्यात्म सिखाने वाले सभी बाबाओं के सभी शिष्य और आश्रम भारत को पतन की तरफ ले जाने का बहुत बड़ा और घिनौना काम कर रहे हैं.

ध्यान समाधी बुद्धत्व आदि की आध्यात्मिक और रहस्यवादी शिक्षाओं से समाज की नैतिकता और सामाजिकता बोध नागरिकता बोध या सामान्य सी कामन सेन्स में कितनी वृद्धि होती है ये ऐसे बाबाओं के शिष्यों की फेसबुक और ट्विटर पर आती हुई पोस्ट्स को देखकर आसानी से समझ में आता है. इन बाबाओं की शिक्षा को इनके अपने शिष्यों के जीवन में या अपने आश्रम में देखा जा सकता है. आप इमानदारी से देखेंगे तो आप पायेंगे कि ऐसी शिक्षा व्यक्ति और समाज को भयानक रूप से अन्धविश्वासी साम्प्रदायिक और पाखंडी बनाती है. भारत भर में यही हो रहा है.

ओशो की प्रगतिशीलता एक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी रही है, ये प्रगतिशीलता एक भ्रम है जो बहुत चतुराई से फैलाया गया है. इसी तरह यह भ्रम भी फैलाया जाता है कि ओशो बुद्ध को गहराई से समझते थे या बुद्ध से बड़ा प्रेम करते थे या कि बुद्ध की शिक्षा को समझते थे यानि कि ‘आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के निषेध को या अनात्मा या अनत्ता’ को समझते थे या स्वीकार करते थे.

ये इस सदी के सबसे बड़े झूठ हैं जो मठाधीश मानसिकता के गुरुओं ने फैलाए हैं. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं, ओशो का अधिकाँश साहित्य स्वयं अंधविश्वासों को बढावा देते हुए लोगों को सम्मोहित करने और उनसे आर्थिक, सामाजिक राजनीतिक लाभ लेने पर केन्द्रित रहा है. ऐसे क्रांतिकारी गुरुओं के जाते ही उनके शिष्य सीधे अध्यात्म और देवी देवताओं तन्त्र मन्त्र यज्ञ हवन इत्यादि पर आ जाते हैं. ये बड़ी मजे की बात है. इससे इन बाबाओं की प्रगतिशीलता के बारे में बनी गलतफहमी दूर होती है.

एक अन्य बड़ी गलतफहमी और बनी हुई है कि ओशो जैसे बाबा लोग बुद्ध को समझते हैं या बुद्ध की शिक्षाओं का सम्मान करते हैं. ये गलतफहमी भी जल्द ही दूर हो जायेगी. ये गलतफहमी सिर्फ उन लोगों के बीच बनी हुई है जो इन बाबाओं के अलावा कुछ और नहीं पढ़ते हैं. सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित भक्त ही ये सोचते हैं कि ये बाबा लोग बुद्ध को समझते हैं.

बुद्ध ने आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म तीनों को अस्वीकार किया है. लेकिन ओशो ने बहुत चालाकी से बुद्ध के मुंह से ब्राह्मणी वेदांत बुलवा लिया है. ओशो स्वयं कहते भी थे कि वे “इन खूंटियों” का इस्तेमाल अपना कोट टांगने के लिए करते हैं. उन्हें बोलना वही है जो वे चाहते हैं उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं वे अपनी बात सभी के मुंह से बुलवा लेते थे.

इस बात को उनके भक्त उनकी महानता समझते हैं लेकिन असल में ये अपराध है. व्यक्ति में साहस होना चाहिए कि वो अपनी बात अपने नाम से कहे जैसे कि जिद्दु कृष्णमूर्ति ने कही है.

जिद्दु कृष्णमूर्ति को बचपन से पूरे यूरोप और अमेरिका में बुद्ध का अवतार बनाकर ही पेश किया गया था लेकिन वे सच में इमानदार आदमी थे इसलिए उस पूरे जंजाल को उन्होंने अपने हाथ से उखाड़ फेका. इसीलिये आज गंभीर दार्शनिक अकादमिक, मनोवैज्ञानिक, कलागत, साहित्यिक और धार्मिक जगत में कृष्णमूर्ति की शिक्षाएं बहुत गहराई से एक नये जगत के निर्माण में एक नये समाज के निर्माण में योगदान कर रही हैं.

वहीं दुसरी तरफ बाजीगरी और अवसरवादिता और अवसरवादी समझौतों से भरी ओशो की बातें (जिनमे उनका अपना ओरिजिनल कुछ भी नहीं है) का लाभ उठाते हुए उनके शिष्य अंधविश्वास फैला रहे हैं. आजकल अकादमिक जगत में विचार के जगत में या धार्मिक दार्शनिक जगत में ओशो को कोई गंभीरता से नहीं लेता. वे सिर्फ एक कल्ट या सम्प्रदाय या चमत्कारिक नेतृत्व शैली की केस स्टडी के रूप में पढ़े पढाये जाते हैं.

ये एक गंभीर मसला है. भारत की भोली भाली जनता को खासकर दलित (अनुसूचित जाति), शूद्र (ओबीसी), स्त्रीयों और आदिवासियों को मुर्ख बनाते हुए उसका शोषण करना एक प्राचीनतम अपराध रहा है. इसके लिए ध्यान समाधि और बुद्धत्व बेचने वाले और उनके “आत्मा परमात्मा सहित अदृश्य और अज्ञेय” की शिक्षा देने वाले सभी पाखंडी बाबा दोषी हैं.

अगर किसी में जरा सी भी संवेदना और समाज या देश की चिंता है तो इस खेल से भोले भाले लोगों को बचाना चाहिए. इस अध्यात्म के पूरे खेल ने ही भारत को काहिल, अन्धविश्वासी और गुलाम बनाया है.

याद रखियेगा किसी भी बाबा की तथाकथित क्रांतिकारी बातों के कारण उनकी मान्यता नहीं है समाज में. ओशो की भी मान्यता उनके क्रांतिकारी रूप के कारण नहीं है. इस क्रांतिकारी रूप को असफल होता हुआ देख उन्होंने खुद क्रान्ति और तर्क को 1960 के अंत में अपने जीवन से विदा कर दिया था और पौराणिक अन्धविश्वास से भरे संन्यास, दीक्षा, शक्तिपात इत्यादि के पारम्परिक आडंबर आरंभ कर दिए थे.

ये नोट करने योग्य बात है कि उनकी अन्धविश्वासी बातों के कारण ही भारतीय समाज में या अन्य देशों में उनकी मान्यता है, उनकी प्रगतिशीलता के कारण नहीं. यही खेल ध्यान समाधि बुद्धत्व इत्यादी की मार्केटिंग करने वाले भारत के सभी आश्रम भी खेल रहे हैं. अंधविश्वास के आधार पर भीड़ इकट्ठी करना और फिर एक दो प्रगतिशील बातें कह देना ये भारत के परलोकवादी बाबाओं की बहुत पुरानी रणनीति रही है.

ऐसी अन्धविश्वासी और मूर्ख भीड़ को फिर तानाशाह और भ्रष्ट राजनेता इस्तेमाल करते हैं. भारत के सभी आध्यात्मिक गुरु इस देश को नष्ट करने में राजनेताओं को मदद करते आये हैं. इसी खेल ने वो भारत और वो समाज बनाया है जो आज हमारे सामने खड़ा है. जगह-जगह वहशी भीड़ अपने ही नागरिकों पर हमले कर रही है. लोगों को सरे आम मारा जा रहा है. मुसलमानों और दलितों आदिवासिओं को इंसान तक नहीं समझा जा रहा है. गोबर और गौमूत्र पर रिसर्च हो रही है.

विज्ञान और शिक्षा सहित तर्क बुद्धि के खिलाफ पूरे देश में एक निर्णायक वातावरण बन चुका है. ये सब अन्धविश्वासी गुरुओं और बाबाओं की शिक्षा और उसका राजनीतिक फायदा उठाने वाली राजनीति की सफलता का सीधा परिणाम है.

इस भारत को और इस समाज को क्या आप ठीक करना चाहते हैं? ये गंभीर प्रश्न है. इन बाबाओं के आध्यात्मिक प्रवचन इन्टनेट पर भारी मात्रा में मौजूद हैं उन्हें बार बार सुनिए और सोचिये कि इन बातों का देश में ज्ञान विज्ञान तर्कबुद्धि और समानता बंधुत्व और सामाजिक या लोकतांत्रिक चेतना के विकास से क्या सम्बन्ध है? थोड़ी जागरूकता से सुनेंगे तो आप पायेंगे कि ये सब परलोक, आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, भाग्यवाद, भक्ति, गुरुभक्ति और खुद की पूजा करना सिखाते हैं, जहां-तहां जरूरत के हिसाब से बुद्ध, महावीर, कबीर, खलील जिब्रान, नीत्शे, सार्त्र आदि को इस्तेमाल करते हैं और इन बड़े-बड़े नामों की आड़ में फिर से अंधविश्वास और पाखंड का जहर पिलाने लगते हैं. इन सभी बाबाओं में ये एक निरन्तरता है एक स्थायी पैटर्न है.

ये बुद्ध की तरह ‘अत्त दीपो भव’ कहकर पहले प्रभावित करेंगे लेकिन थोड़ी ही देर में गुरु भक्ति पर “दिव्य प्रवचन” देकर अपना चरणामृत पीने की शिक्षा देने लगेंगे. ये एक सांस में ‘अत्त दीपो भव’ सिखाते हैं और दुसरी सांस में गुरुभक्ति भी सिखाते हैं. ये जहर और इलाज दोनों एक ही काउन्टर से बेचकर कमाई करते हैं.

ये गंभीर मामला है. ऐसे बाबाओं की शिक्षाओं से खुद बचना और दूसरों को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है. याद रखियेगा भारत में शोषण की यांत्रिकी सीधे-सीधे राजनीतिक या सामाजिक या दार्शनिक बहस पर सवार होकर नहीं आती है. भारत में शोषण और जहालत की बीमारी धर्म और धार्मिक व्याख्याओं पर सवार होकर आती है. यहाँ राजनीति या लोकतंत्र या समाज या दर्शन की किसे फ़िक्र है?

एक अनपढ़, बेरोजगार, भयभीत और अन्धविश्वासी जनता को ले देकर धर्म, मिथकों, महापुरुषों और देवी देवताओं और शास्त्रों से ही मतलब रहता है, वे उसी में सारे आश्ववासन और इलाज खोजते हैं. इस बात को बाबाजी, व्यापारी और नेताजी खूब अच्छे से समझते हैं. अब तो बाबा लोग भी व्यापारी हो चुके हैं. इसीलिये बाबाओं व्यापारियों और नेताओं में एक दिव्य गठबंधन होता है, वे हर दौर में इन शास्त्रों, महापुरुषों की व्याख्याओं को बदलकर इस देश की जनता को काबू में रखते हैं.

इस जहरीले गठ्बन्धन को भारत के गरीबों मजदूरों शूद्रों दलितों को ठीक से समझना चाहिए, तभी वे इससे मुक्त हो सकेंगे. ऊपर-ऊपर से राजनीति, व्यापार, प्रशासन, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति इत्यादि बदल जाने से न तो पहले कुछ हुआ है न ही आगे ही कुछ होगा.
जब तक समाज के भीतर एक गहरा जागरण – एक तरह की नास्तिकता और धर्म के सम्मोहन के प्रति तिरस्कार का भाव – पैदा नहीं होता तब तक भारत के बहुजनो, गरीबों, स्त्रीयों, शोषितों की मुक्ति की कोई संभावना नहीं है.

जब तक शोषित खुद ही शोषण के दलदल में गोते लगाने में आनन्द लेते रहेंगे तब तक दुनिया की कोई ताकत उन्हें उस दलदल से बाहर नहीं निकाल सकती.

(लेखक: संजय श्रमण)

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