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मग्गवग्गो

मग्गानट्ठङ्गिको सेट्ठो, सच्चानं चतुरो पदा
विरागो सेट्ठो धम्मानं
, द्विपदानञ्च चक्खुमा.

हिंदी: मार्गों में आष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है, सच्चाइयों में चार सत्य, धम्मों में वीतरागता श्रेष्ठ है, देवमनुष्यादि द्विपदों में चक्षुमान बुद्ध.

एसेव मग्गो नत्थञ्ञो, दस्सनस्स विसुद्धिया
एतञ्हि तुम्हे पटिपज्जथ
, मारस्सेतं पमोहनं.

हिंदी: दर्शन की विशुद्धि (ज्ञान की प्राप्ति) के लिए यही मार्ग है, कोई दूसरा नहीं. तुम इसी पर आरुढ़ होतो, यह मार को हक्का-बक्का करने वाला, किंकर्तव्यविमूढ़ बनाने वाला है.

एतञ्हि तुम्हे पटिपन्ना, दुक्खस्संतं करिस्सथ
अक्खातो वो मया मग्गो
, अञ्ञाय सल्लकन्तनं.

हिंदी: इस मार्ग पर आरुढ़ होकर तुम दु:ख का अंत कर लोगे. मेरे द्वारा शल्य काटने वाले इस मार्ग को स्वयं जान कर तुम्हारे लिए आख्यान किया गया है.

तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता
पटिपन्ना पमोक्खन्ति
, झायिनो मारबन्धना.

हिंदी: तपना तो तुम्हे ही पड़ेगा, तथागत तो मार्ग आख्यात करते हैं. इस मार्ग पर आरुढ़ होकर ध्यान करने वाले मार के बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाते है.

“सब्बेसङ्खारा अनिच्चा”ति, यदा पञ्ञाय पस्सति
अथ निब्बिन्दति दुक्खे
, एस मग्गो विसुद्धिया.

हिंदी: “सारे संस्कार अनित्य हैं” यानि जो कुछ होता है वह नष्ट होता ही है. इस सच्चाई को जब कोई विपश्यन-प्रज्ञा से देख-जान लेता है, तब उसको दु:खों से निर्वेद प्राप्त होता है अर्थात दु:ख-क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है, ऐसा है यह विशुद्धि (विमुक्स्ति) का मार्ग.

“सब्बे सङ्खारा दुक्खा”ति, यदा पञ्ञाय पस्सति
अथ निब्बिन्दति दुक्खे
, एस मग्गो विसुद्धिया.

हिंदी: “सारे संस्कार दु:ख है” यानि जो कुछ उत्पन्न होता है, वह नाशवान होने के कारण दु:ख ही है. इस सच्चाई को जब कोई विपश्यना-प्रज्ञा से देख-जान लेता है, तब उसको सभी दु:खो से निर्वेद प्राप्त होता है. अर्थात दु:ख क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है, ऐसा है यह विशुद्धि (विमुक्ति) का मार्ग!

सब्बे धम्मा अनत्ता”ति, यदा पञ्ञाय पस्सति
अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया.

हिंदी: “सभी धम्म अनात्म हैं” यानि लोकीय अथवा लोकोत्तर जो कुछ भी है, वह अनात्म है, ‘मैं’ ‘मेरा’ नहीं है. इस सच्चाई को जब कोई विपश्यना-प्रज्ञा से देख-जान लेता है, तब उसको सभी दु:खों से निर्वेद प्राप्त होता है, अर्थात, दु:ख-क्षेत्र के प्रति भोक्ताभाव टूट जाता है, ऐसा है यह विशुद्धि (विमुक्ति) का मार्ग!

उट्ठानकालम्ल्हि अनुट्ठहानो, युवा बली आलसियं उपेतो
संसन्नसङ्कप्पमनो कुसीतो
, पञ्ञाय मग्गं अलसो न विन्दति.

हिंदी: जो उद्योग करने के समय उद्योग नहीं करता, युवा और बलशाली होने पर भी आलस्य करता है, मन के संकल्पों को गिरा देता है, निर्वीर्य होता है – ऐसा आलसी व्यक्ति प्रज्ञा का मार्ग नहीं पा सकता.

वाचानुरक्खी मनसा सुसंवुतो, कायेनच नाकुसलंकयिरा
एते तयो कम्मपतेह्विसोधये
, आराधये मग्गमिसिप्पवेदितं.

हिंदी: वाणी को संयत रखें, मन को संयत रखें और शरिर से कोई अकुशल काम न करें. इन तीनों कर्मपथों का विशोधन करें. ऋषि (बुद्ध) के बताये (अष्टांगिक) मार्ग का अनुसरण करें.

योगा वे जायती भूरि, अयोगा भूरिसङ्खयो
एतं द्वेधापथं ञत्वा
, भयाव विभवाय च
तथात्तानं निवेसेय्य
, यथा भूरि पवड्ढति.

हिंदी: योग के अभ्यास से प्रज्ञा उत्पन होती है, उसके अभाव से उसका क्षय होता है. उत्पत्ति और विनाश के योग तथा अयोग इन दो प्रकार के मार्गों को जान कर अपने आपको इस प्रकार विनियोजित करे जिससे प्रज्ञा की भरपूर वृद्धि हो.

वनं छिन्दथ मा रुक्खं, वनतो जायते भयं
छेत्वा वनञ्च वनथञ्च
, निब्बना होथ भिक्खवो.

हिंदी: वन (आसक्ति) को काटो, वृक्ष (शरीर) को नहीं. भय वन से पैदा होता है. है साधको! वन को, और झाड़ (तृष्णा) को काटकर अनासक्त हो जाओ.

याव हि वनथो न छिज्जति, अणुमत्तोपि नरस्स नारिसु
पटिबद्धमनोव ताव सो
, वक्छो खीरपकोव मातरि.

हिंदी: जब तक अणुमात्र (जरा-सी) भी नर की नारियों के प्रति कामना बनी रहती है, तब तक जैसे दूघ पीने वाला बछड़ा माता में आबद्ध रहता है वैसे ही वह नर भी उनमें आसक्त रहता है.

उच्छिंद सिनेहमत्तनो, कुमुदंसारदिकं वपाणिना
सन्तिमग्गमेव ब्रूहय
, निब्बानं सुगतेन देसितं.

हिंदी: जिस प्रकार हाथ से शरद के कुमुद को तोड़ा जाता है, उसी प्रकार अपने ह्रदय से स्नेह को उच्छिन्न कर डालो, सुगत (बुद्ध) द्वारा उपदिष्ट (इस) शांतिमार्ग निर्वाण को ही भावित करो.

इध वस्सं वसिस्सामि, इध हेमन्तगिम्हिसु
इति बालो विचिन्तेति
, अन्तरायं न बुज्झति.

हिंदी: मैं यहां वर्षाकाल में रहूंगा, यहाँ हेमंत अरुअ ग्रीष्म में – मूढ़ व्यक्ति इस प्रकार सोचता है और किसी संभावित बाधा को नहीं बूझता कि मैं किसी भी समय, देश अथवा उम्र में इस जीवन से कूच कर सकता हूँ.

तं पुत्तपसुसम्मत्तं, ब्यासत्तमनसं नरं
सुत्तं गामं महोघोव
, मच्चु आदाय गच्छति.

हिंदी: जैसे सोये हुए गांव को कोबी भी बड़ी बाढ़ बहा कर ले जाय, वैसे ही पुत्र और पशु के नशे में धुत्त आसक्तचित्त व्यक्ति को मृअत्यु पकड़कर ले जाती है.

न सन्ति पुत्ता ताणाय, न पिता नापि बन्धवा
अन्तके नाधिपन्नस्स
, नत्थि ञातीसु ताणता.

हिंदी: पुत्र रक्षा नहीं कर सकते, न पिता और न ही बंधुजन. जब तक मृत्यु पकड़ लेती है तब जाति वाले रक्षा नहीं कर सकते.

एतमत्थवसं ञत्वा, पण्डितो सीलसंवुतो
निब्बानगमनं मग्गं
, खिप्पमेव विसोधये.

हिंदी: इस तथ्य को जान कर शील में संयत पंडित (समझदार व्यक्ति) निर्वाण की ओर ले जाने वाले मार्ग का शीघ्र ही विशोधन करे.


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— भवतु सब्ब मंगलं —

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