HomeDhammapadपकिण्णक वग्गो

पकिण्णक वग्गो

मत्तासुखपरिच्चागा, पस्से चे विपुलं सुखं
चजे मत्तासुखं धीरो
, सम्पस्सं विपुलं सुखं.

हिंदी: यदि कोई धीर व्यक्ति थोड़े से सुख के परित्याग से विपुल निर्वाण सुख का लाभ देखे, तो वह विपुल सुख का ख्याल करके थोडे‌ से सुख को छोड़ दे.

परदुक्खूपधानेन, अत्तनो सुखामिच्छति
वेरसंसग्गसंसट्ठो
, वेरा सो न परिमुच्चति.

हिंदी: दूसरे को दु:ख देकर जो अपने लिए सुख चाहता है, वैर से संसर्ग में पड़कर वह वैर से मुक्त नहीं हो पाता.

यञ्हि किच्चं अपविद्धं, अकिच्चं कयिरति
उन्नळानं पमत्तानं
, तेसं वड्ढन्ति आसवा.

हिंदी: जो करणीय से हाथ खींच ले किंतु अकणीय को करे, ऐसे खोखले (घमंडी) प्रमादियों के आश्रव (चित्तमल) बढ़ते हैं.

येसञ्च सुसमारद्धा, निच्चं कायगता सति
अकिच्चं ते न सेवन्ति, किच्चे सातच्चकारिनो
सतानं सम्पजानानं, अत्थं गच्छन्ति आसवा.

हिंदी: जिनकी कायानुस्मृति नित्य उपस्थित रहती है (यानि जो सतत कायानुपश्यन करते रहते हैं, काय के प्रैत एवं काय में होने वाली संवेदनाओं के प्रति जागरुक रहते हैं), वे साधक कभी कोई अकरणीय काम नहीं करते, सदा करणीय ही करते हैं. ऐसे स्मृतिमान और प्रज्ञावान साधकों के आश्रव क्षय को प्राप्त होते हैं (उनके चित्त के मैल नष्ट होते हैं).

मातरं पितरं हन्त्वा, राजानो द्वे च खत्तिये
रट्ठं सानुचरं हन्त्वा
, अनीघो याति ब्राह्मणो.

हिंदी: माता (तृष्णा), पिता (अहंकार), दो क्षत्रिय राजाओं (शाश्वत दृष्टि और उच्छेद दृष्टि, अनुचर (राग) सहित राष्ट्र (बारह आयतनो) का हनन कर ब्राह्मण (क्षीणाश्रव) दु:खरहित हो जाता है.

मातरं पितरं हन्त्वा, राजानो द्वे च सोत्थिये
वेयग्घपञ्चमं हन्त्वा
, अनीघो याति ब्राह्मणो.

हिंदी: माता (तृष्णा), पिता (अहंकार), दो श्रोत्रिय (ब्राह्मण) राजाओं (शाश्वत दृष्टि और उच्छेद दृष्टि) और पांच व्याघ्रों में (पांच नीवरणों में) पांचवें (संदेह) का हनन कर ब्राह्मण (क्षीणाश्रव) दु:ख़रहित हो जाता है.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च
, निच्चं बुद्धगता सति.

हिंदी: जिनकी दिन-रात, हर समय बुद्ध-बिषयक स्मृति बनी रहती है, वे गौतम (भगवान बुद्ध) के श्रावक सदैव भली-भांति प्रबुद्ध (जाग्रत) बने रहते हैं.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च
, निच्चं धम्मगता सति.

हिंदी: जिनकी दिन-रात, हर समय धम्म-बिषयक स्मृति बनी रहती है, वे गौतम (भगवान बुद्ध) के श्रावक सदैव भली-भांति प्रबुद्ध (जाग्रत) बने रहते हैं.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च
, निच्चं सङ्घगता सति.

हिंदी: जिनकी दिन-रात, हर समय संघ-बिषयक स्मृति बनी रहती है, वे गौतम (भगवान बुद्ध) के श्रावक सदैव भली-भांति प्रबुद्ध (जाग्रत) बने रहते हैं.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च
, अहिंसाय रतो मनो.

हिंदी: जिनका मन दिन-रात अहिंसा में रमा रहता है, वे गौतम (भगवान बुद्ध) के श्रावक सदैव भली-भांति प्रबुध बने रहते हैं.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च
, भावनाये रतो मनो.

हिंदी: जिनकी दिन-रात (मैत्री) भावना में रत रहता है, वे गौतम (भगवान बुद्ध) के श्रावक सदैव भली-भांति प्रबुद्ध (जाग्रत) बने रहते हैं.

दुप्पब्बज्जं दुरभिरमं, दुरावासा घरा दुखा
दुक्खोसमानसंवासो
, दुक्खानुपतितद्धगू
तस्मा न चद्धगू सिया
, न च दुक्खानुपतितो सिया.

हिंदी: कष्टपूर्ण प्रव्रज्या में रत रहना दुष्कर होता है, न रहने योग्य घर दु:खद रहते  हैं, असमान व्यक्ति से सहवास दु:ख़दायी होता है, मार्ग (आवागमन)   का पथिक होना दु:खपूर्ण होता है. इसलिए न तो (संसाररूपी) मार्ग का पठीक बने और न दु:ख में पड़ने वाला बने.

सद्धो सीलेन सम्पन्नो, यसोभोगसमप्पितो
यं यं पदेसं भजति
, तत्थ तत्थेव पूजितो.

हिंदी: श्रद्धावान, शीलवान और यश तथा भोग से युक्त कुलपुत्र जिस-जिस प्रदेश में जाता है वहीं-वहीं लाभ-सत्कार से पूजित होता है.

दूरे सन्तो पकासेन्ति, हिमवन्तोव पब्बतो
असंन्तेत्थ न दिस्सन्ति
, रत्तिं खित्त यथा सरा.

हिंदी: संत लोग हिमालय पर्वत के समान दूर से ही प्रकाशमान होते हैं, किंतु असंत दुर्जन यहीं पास में होने पर भी रात में फेंके गये बाण की भांति दिखाई नहीं देते.

एकासनं एकसेय्यं, एको चरमतन्दितो
एको दमयमत्तानं
, वनन्ते रमितो सिया.

हिंदी: एक आसन रखने वाला, एक शय्या रखने वाला, तंद्रा रहित हो एकाकी विचरण करने वाला, अपने को दमन कर अकेला ही (स्त्री, पुरुष, शब्दादि से विरहित) वनांत में रमण करे.


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— भवतु सब्ब मंगलं —

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