1. बुद्ध धम्म क्या हैं?

सवाल: बौद्ध धर्म क्या हैं?

जवाब: बौद्ध शब्द बोधी से बना हैं. जिसका अर्थ होता हैं जागृती. इस तरह बौद्ध धर्म को जागृती का दर्शंनशास्त्र कहना चाहिये. सिद्धार्थ गौतम ने 35 वर्ष की उम्र में बुद्धत्व प्राप्त किया. जिससे इस दर्शनशास्त्र का जन्म हुआ. बौद्ध धर्म आज 2560 वर्ष से पुराना हैं. जिसके करीब करीब 380 दशलक्ष (मिलियन) अनुयायी दुनिया में हैं. सौ साल पहले बौद्ध धर्म को माननेवालों में एशियाई लोग प्रमुख थे, पर समय के साथ युरोप, ऑस्ट्रेलिया व अमरीका में भी इसके माननेवाले बध रहे हैं.

सवाल: तो क्या बौद्ध धर्म मात्र एक दर्शनशास्त्र (फिलॉसॉफी) हैं?

जवाब: फिलॉसॉफी शब्द दो शब्दों से बना हैं. फिलो (Philo) यानि प्रेम और सोफिया (Sophia) यानि विवेक. तो फिलॉसॉफी यानि विवेकपूर्ण प्रेम या प्रेम और विवेक. दोनों अर्थ बौद्ध धर्म को पूर्णत: स्पष्ट करते हैं.

बौद्ध धर्म सिखाता अहि कि हम अपनी बुद्धीमता को पूर्णत: विकसित करें ताकि हम साफ समझ सके. और यह भी सिखाता हैं कि हम मैत्री और करूणा को विकसित करे ताकि हम हर एक के सच्चे मित्र बन सके.

तो बौद्ध धर्म यह मात्र दर्शनशास्त्र नही हैं. अपितु यह एक सर्वोतम दर्शनशास्त्र हैं.

सवाल: बुद्ध कौन थे?

जवाब: उत्तरी भारत में 563 ई. पू. एक बालक राजघराने में पैदा हुआ. वह काफी ऐशो आराम मे पला और बढा. मगर उसे लगा कि, संसार की सुविधाएँ व सुरक्षा, पूर्ण सुख नही देती. अपने आसपास दु:ख देखकर वह बहुत व्यथित हुआ और उसने दु:ख मुक्ति का उपाय ढूँढने का संकल्प किया. 29 वर्ष की उम्र में पत्नी, बच्चे को त्यागकर वह उस जमाने के श्रेष्ठ धार्मिक गुरुओं के चरणों में धर्म सीखने निकल पडा. उन्होने उसे बहुत कुछ सिखाया पर उनमे से कोई भी मनुष्य के दु:ख का कारण व उसका विनाश करना नही जानता था. छ्ह साल सतत अभ्यास, संघर्ष व ध्यान से उन्हे अज्ञान के विनाश होने की अनुभूती हुई. इस दिन से वे “बुद्ध”, यानि जो जाग गया, कहे जाने लगे. इसके बाद वे 45 वर्ष और जीवित रहे. उनकी करूणा व शांती अद्भुत थी, उनके हजारों अनुयायी रहे. 80 वर्ष की उम्र में वृद्धावस्था व बिमारी की दशा मे उन्होंने अत्यंत शांति से अपना देह त्याग दिया.

सवाल: ज्ञान प्राप्ती पर अगर उन्हे बुद्ध कहा गया, तब इसके पहले उनका नाम क्या था?

जवाब: बुद्ध के कुल का नाम गौतम था, जिसका मतलब होता हैं ‘सर्वोत्तम गाय’, जो उन दिनों प्रतिष्ठा व संपति का प्रतीक थी. उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया जिसका अर्थ हैं ‘लक्ष्य प्राप्त करना, एक ऐसा नाम जो एक राजा अपने बेटे को देना चाहेगा.

सवाल: क्या बुद्ध द्वारा अपनी पत्नी, बच्चों को छोडना गैरजिम्मेदाराना नही था?

जवाब: बुद्ध के लिये अपना परिवार छोडना आसान नही रहा होगा. छोडने से पहले वे काफी दुविधा और असमंजस से गुजरे होंगे. यहाँ पर चुनाव करना पडा; परिवार या विश्व के प्रति समर्पण. अतंत: उन्होने करूणावश स्वयं को विश्व के कल्याण के लिये समर्पित किया. जिसका लाभ आज तक मनुष्यता ले रही हैं. उनका ग्रह त्याग गैरजिम्मेदाराना नही था. शायद यह दुनिया का सबसे बडा त्याग था.

सवाल: बौद्ध धर्म क्या हैं? और जब आज बुद्ध नही रहे तब वे हमारी मदद कैसे करेंगे?

जवाब: बिजली के आविष्कारक फैराडे (Faraday) अब नही रहे मगर उनका आविष्कार आज भी हमारे काम आता हैं. लुईस पाश्चर (Louis Pasteur) जिसने कई बिमारीयों का इलाज खोजा वह आज नही हैं पर उनका वैध्यकिय अंवेषण (Medical Discoveries) आज भी जीवित हैं. लियोनार्दो दा विंची (Leonardo da Vinci) जिसने अप्रतिम कलाकृतीया निर्मित कि, वह आज नही हैं पर उनकी कलाकृतीया आज भी हमारे ह्रदय को प्रसन्नता देती हैं. महान व्यक्तियों को गुजरे सदिया भी बीत जाये तो भी उनकी रचनाये व उपलब्धियाँ हमे आज भी प्रेरणा देती हैं.

बुद्ध को गुजरे 2500 साल बीत गये पर उनकी शिक्षा आज भी लोगो की सहायता करती हैं. उनका आदर्श आज भी लोगों को प्रेरित करता हैं, उनके वचन आज भी लोगों की जिंदगी बदलते हैं. सिर्फ एक बुद्ध में ही सदियों तक शक्ति होती हैं.

सवाल: क्या बुद्ध देवता/भगवान थे?

जवाब: नही, बुद्ध देवता नही थे. उन्होने ऐसा दावा नही किया कि वे देवता हैं, या देवतापुत्र हैं या देवदूत हैं. वे एक मानव थे जिन्होने अपने आपको परिशुद्ध किया और शिक्षा दी कि अगर हम उनकी शिक्षानुसार आचरण करें तो हम भी परिशुद्ध हो सकते हैं.

सवाल: अगर बुद्ध देवता नही हैं तो लोग उनकी पूजा क्यों करते हैं?

जवाब: पूजा कई प्रकार की होती हैं. कुछ लोग पूजा मे भगवान की प्रशंसा करके, उन्हे भेंट चढाके स्वयं के लिये कुछ मांगते हैं, इस श्रद्धा से कि भगवान उनकी प्रशंसा सुनेंगे, भेंट स्वीकारेंगे और उनकी इच्छाये पूर्ण करेंगे. बौद्ध लोग इस तरह की पूजा नहि करते. दूसरी तरह की पूजा वो होती हैं जिसमे हम अपने आदर्श के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं. जब शिक्षक कक्षा में आते हैं तो विद्यार्थी खडे हो जाते हैं, जब हम प्रतिष्टों से मिलते हैं तो उंनसे हाथ मिलाते हैं, जब राष्ट्रगान बजता हैं तो हम सलामी देते हैं. ये सब हमारे आदर व पूजा करने के ढंग सिर्फ इतना ही दर्शाते हैं कि हमे विशिष्ठ व्यक्तियों या वस्तुओं से कैसा लगाव हैं. यह होती बौद्धों की पूजा.

ध्यान मुद्रा में हाथ रखे बुद्ध की मूर्ती और उनकी करुणापूर्ण मुस्कान हमे भीतर शांति और प्रेम की खोज करने की याद दिलाता हैं. अगरबत्ती की खुश्बु हमे शील के सर्वव्यापी सुगंध की स्मृती जगाती हैं, दिये की ज्योती हमे ज्ञान के प्रकाश की स्मृती दिलाती हैं और फूल जो जल्दी ही मुरझा के सूखने वाले हैं, हमे अनित्यता का स्मरण दिलाते हैं. जब हम झुकते हैं तो बुद्ध की शिक्षा से जो हमने पाया हैं उसके प्रति अनुग्रह व्यक्त करते हैं. यही बोद्धों की पूजा का अर्थ हैं.

सवाल: मैंने सुना हैं कि बौद्ध लोग मूर्ती पूजा करते हैं?

जवाब: यह विधान केवल लोगों की गलतफहमी दर्शाता हैं. शब्दकोष के अनुसार मूर्ती उसे कहते हैं जिसमे एक प्रतिमा या चित्र होता हैं, जिसकी भगवान मानकर पूजा की जाती हैं. और जैसा हमने देखा, बौद्ध लोग भगवान मे विश्वास नही करते तब फिर वे लकडी या धातु की मूर्ती को कैसे भगवान मान सकेंगे? सभी धर्म अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिये कुछ प्रतीक इस्तेमाल करते हैं.

तावोइस्म (Taoism) में, यीन-यांग (Ying-Yang) का इस्तेमाल विरोधों के बीच समन्वय दिखाने के लिये किया जाता हैं. सिख धर्म मे आध्यात्मिक जीवन मे संघर्ष का प्रतीक तलवार हैं. ईसाई धर्म मे मछली को येशु का अस्तित्व और क्रॉस को उनके बलिदान का प्रतीक माना जाता हैं.

बौद्ध धर्म मे, बुद्ध की प्रतीमा हमे बौद्ध शिक्षाओं में मानव आयाम का स्मरण दिलाती हैं, असल में बौद्ध धर्म मानव-केंद्रित हैं न कि देव-केंदित हैं. हमे बाहर नही बल्कि स्वयं के भीतर विवेक व पूर्णत्व उपलब्ध करना हैं. अतएव बौद्ध मूर्तीपूजक हैं यह कहना उतना ही मुर्खतापूर्ण हैं जितना कि यह कहना कि ईसाई लोग मछली या क्रॉस की पूजा करते हैं.

सवाल: बौद्ध विहारों में लोग अजीब चीजें क्यों करते हैं?

जवाब: जिसे हम नही समझ सकते उसे हम अजीब कहते हैं. ऐसी कृतयों को अजीब कहने के बजाय हम उन्हे समझने की कोशिश करनी चाहिये. यह सच हैं कि कुछ परम्पराओं के मूल में प्रचलित नासमझिया तथा अंधविश्वास होते हैं; और ऐसी गलग धारणायें केवल बौद्ध धर्म में ही नही बल्कि सभी धर्मों में समय-समय पर उत्पन्न होती हैं. बुद्ध ने अपनी शिक्षा विस्तार से स्पष्ट की हैं पर फिर भी लोग इसे नही समझ सकते हैं तो यह बुद्ध का कसूर नही हैं.

बौद्ध शास्त्रों  में एक कहावत हैं.

“अगर कोई बीमार, वैध्य के उपलब्ध होने पर भी इलाज नही कराता हैं तो यह वैध्य का कसूर नही हैं. ठीक इसी तरह अगर कोई व्यक्ति चित के विषाक्त होने पर भी बुद्ध से मदद नही लेता हैं तो यह बुद्ध का कसूर नही हैं.” Jn. 28-9

बौद्ध धर्म या किसी भी धर्म का मूल्य सही तरीके से आचरण न करने वालों से नही आंका जा सकता. अगर आप बुद्ध की सही शिक्षा पाना चाहते हैं तो बौद्ध साहित्य का अभ्यास करे या उसे सही से जानने वालों से संपर्क करें.

सवाल: मैं कई बार धम्म शब्द को देखता हुँ. इसका क्या मतलब हैं?

जवाब:  धम्म (संस्कृत: धर्म) शब्द के अनेक अर्थ हैं. लेकिन, बौद्ध धर्म मे इसका अर्थ होता हैं सत्य, वास्तविकता, सही-सही रूप में वस्तुएँ और स्थितियाँ जैसे हैं वैसे देख सकना. और क्योंकि हम बौद्ध शिक्षाओं में सत्य देखते हैं, हम उन्हे भी धम्म कहते हैं.

सवाल: बौद्धों में क्रिसमस के समान क्या हैं?

जवाब: परंपरा के अनुसार, राजपुत्र सिद्धार्थ का जन्म, बुद्धत्व प्राप्ती, और महापरिनिर्वाण सभी वैशाख पूर्णिमा के दिन हुआ जो भारतीय तिथि के अनुसार दूसरा महीना व पश्चिमि तिथि के अनुसार अप्रैल-मई महीना हैं. इस दिन बौद्ध देशों में लोग विहारों मे जाते हैं, अलग-अलग समारोहों मे सम्मिलित होते हैं, एवं ध्यान आदि करते हैं.

सवाल: अगर बौद्ध धर्म इतना अच्छा हैं तो फिर कुछ बौद्ध देश गरीब क्यों हैं?

जवाब: ;अगर आपके अनुसार गरीब का अर्थ निर्धनता हैं तो यह सच हैं कि कुछ बौद्ध देश गरीब हैं. लेकिन, गतीब का अर्थ अगर अतृप्त जीवन हैं, तब तो कुछ बौद्ध देश परम समृद्ध हैं. उदाहरण के तौर पर अमरीका समृद्ध व शक्तिशाली राष्ट्र हैं पर वहाँ दुनिया के सबसे ज्यादा अपराध होते हैं. वहा औलाद अपने वृद्ध माता-पिता को त्याग देते हैं, जो निपत अकेलेपन मृत्यु को वश हो जाते हैं. वहा घरेलु हिंसा, बच्चों पर जुल्म, नशा खोरी आदि प्रमुख समस्या हैं. वहाँ 3 में से 1 शादि में तलाक होता हैं. तो पैसे से तो समृद्ध हैं मगर जीवन की पूर्णता के अर्थों में गरीब हैं.

अब अगर आप कुछ पारंपरिक बौद्ध देशों को देखेंगे तो आप काफी अलग पारिस्थिति पायेंगे. वहा औलाद अपने माता-पिता को आदर व सम्मान देती हैं. अपराध कम हैं, तलाक, आत्म-हत्या बहुत कम हैं. पारंपरिक मूल्य जैसे दान, अतिथियों का स्वागत, सहनशीलता, औरों के प्रति सम्मान इत्यादि आज भी अपनी जगह हैं. आर्थिक रूप से दुर्बल पर अमरीका से भी संपन्न जीवन. फिर भी यदि हम बौद्ध देशों की केवल आर्थिक स्थिति का मूल्याकंन करते हैं तो जापान आज बहुत समृद्ध हैं जिस में काफी जनसंख्या बौद्धों की हैं.

सवाल: आमतौर पर बौद्ध लोग कोई सामाजित सेवाएँ करते दिखाई क्यों नही देते?

जवाब: शायद इसलिए कि बौद्धों को अपने कार्य का दिखावा जरूरी नही लगता. की साल पह्ले जापानी बौद्ध नेता निक्को निर्वाणो (Nikkyo Nirwano) को अंतरधर्मीय शांति को स्थापित करने के लिए टेम्पलटन (Templeton Prize) पुरस्कार मिला था. इसी तरह एक बौध भिक्षु को नशीली दवाओं के व्यसन मुक्ति पर गौरवशाली मैगसेसे (Magsaysay) पुरस्कार हाल ही मे मिला था. 1987 में एक अन्य थाई बौद्ध भिक्षु कांतयपिवत (Kantayapiwat) को देहातों के बेघर बच्चों की सालों मदद करने पर नॉर्वेजियन बाल शांति पुरस्कार मिला था. और बडे पैमाने पर भारत मे सामाजिक कार्य करने वाले त्रिरत्न बौद्ध महासंघ के बारे में क्या कहना? उन्होने पाठशालाएँ, बाल विकास केंद्र, अस्पताल, आत्मनिर्भरता के लिय लघु उद्योग आदि का निर्माण किया हैं. बाकि धर्मों की तरह बौद्ध भी मदद कार्यों को धार्मिक आचरण की अभिव्यक्ति की तरह देखते हैं. मगर इसे प्रतिष्ठा पाने के लिये करने के बजाय चुपचाप करना जरूरी मानते हैं.

सवाल: बौद्ध धर्म के अनेक प्रकार क्यों हैं?

जवाब: जैसे अनेक प्रकार की शक्कर होती हैं. खडी शक्कर, सफेद शक्कर, चाशनी आदि – पर हैं सभी मीठी शक्कर. वे विभिन्न प्रकार से बनाई जाती हैं ताकि उसका विभिन्न ढंग से इस्तेमाल हो. बौद्ध धर्म भी ऐसा हैं – इसमे थेरवाद, झेन, शुद्धभूमी, योगाचार, वज्रयान आदि परंपराएँ हैं. मगर वह सभी बुद्ध की शिक्षाएँ हैं और उन सब में एक सा स्वाद हैं – विमुक्तीका.

बौद्ध धर्म मे अनेक परंपराओं की निर्मिति हुई ताकि विभिन्न संस्कृतियों मे ढाला जा सके. सदियों मे उसकी कई व्याख्याए हुई ताकि वह नई पीढी के लिए समयोचित रहे. बाहरी तौर से बौद्ध धर्म भले ही भिन्नतापूर्ण दिखता हो पर उसके केंद्र मे वही चार आर्य सत्य व आर्य अष्टांगिक मार्ग हैं. बौद्ध धर्म सहीत सभी बडे धर्मों की अनेक शाखाएँ एवं परशाखाएँ बनी. शायद बौद्ध धर्म मे और बाकि कुछ धर्मों मे यही फर्क हैं कि बौद्ध धर्म की सभी शाखाएँ एक दूसरे के प्रति सहिष्णुतापूर्ण एवं मित्रतापूर्ण हैं.

सवाल: आप बौद्ध धर्म के प्रशंसक हैं. मुझे लगता हैं आप केवल बौद्ध धर्म मे विश्वास रखते हैं और बाकी सभी धर्मों को झूठा मानते हैं.

जवाब: बुद्ध की शिक्षा समझने वाला कोई भी बौद्ध धर्मी बाकी धर्मों को गलत नही मानता. धर्मों को जानने की प्रमाणिक व खुले मन से कोशिश करने वाला कोई भी व्यक्ति इस तरह नही सोचता. विभिन्न धर्मों का अभ्यास करने पर पहली बात पता चलती हैं; कि इनमें समानता क्या हैं? सभी धर्म इस बात को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य की वर्तमान स्थिति असमाधान/असंतोष की हैं. सभी मानते हैं कि मनुष्य की स्थिति सुधारने के लिए दृष्टि व आचरण मे परिवर्तन की जरूरत हैं. सभी धर्म प्रेम, करूणा, संयम, दान व सामाजिक उतरदायित्व दिखाते हैं, और किसी रूप में पूर्णत्व का अस्तित्व स्वीकारते हैं. इसे समझाने के लिए विभिन्न भाषाये, व्याख्याएँ एवं संकेतों का इस्तेमाल होता हैं. पर जब कोई मात्र अपने ही संपूर्ण दृष्टिकोण को सही मानता हैं तब असंयम, अभिमान व आत्मरौढी का निर्माण होता हैं.

कल्पना करे, एक अंग्रेज, एक फ्रेंच, एक चिनी व एक इंडोनेशियाई एक कप को देख रहे हैं. अंग्रेज कहता हैं यह एक कप हैं. फ्रेंच कहता हैं यह एक ‘तस्से’ हैं. फिर चिनी कहता हैं आप दोनो गलत हैं यह एक ‘पई’ हैं. अंत मे इंडोनेशियाई सब पे हंसता हैं और कहता हैं, कैसे मुर्ख हैं आप; यह एक ‘कवन’ हैं. फिर अंग्रेज शब्दकोष दिखाकर कहता हैं, मैं यह साबित कर सकता हूँ कि यह एक कप हैं. मेरा शब्दकोष यही कहता हैं. फ्रेंच कहता हैं कि, तुम्हारा शब्दकोष गलत हैं. क्योंकि मेरा शब्दकोष कहता हैं कि यह एक तस्से हैं. चिनी कहता हैं मेरा शब्दकोष इसे पेई कहता हैं और मेरा शब्दकोष हजारों साल पूराना हैं, इसलिये सही हैं. और चिनी बोलने वालों की संख्या और भाषाओं से ज्यादा हैं. इसलिये यह पेई ही हैं. इनके विवादों के बीच दूसरा आदमी आता हैं और कप से पीकर कहता हैं, आप चाहे इसे कप, तस्से, पेई या कवन कहे पर इसका उपयोग तो पानी भरने व पीने के लिये होता हैं. विवाद छोडीये और अपनी प्यास बुझाईये. यह बौद्धों की विभिन्न धर्मों के प्रति दृष्टि हैं.

सवाल: कुछ लोग कहते हैं कि सभी धर्म वास्तव में समान हैं. क्या आप इससे सहमत हैं?

जवाब: धर्म काफी गहन व विविधतापूर्ण होने के कारण इतने सरल विधान मे समाना कठिन हैं. एक बौद्ध कहेगा कि इस विधान मे सच्चाई और झूठ दोनों सम्मिलित हैं. बौद्ध शिक्षा मे परमेश्वर को नकारा हैं. जब की कुछ धर्मों में भगवान का अस्तित्व माना जाता हैं. बौद्ध शिक्षा के अनुसार हर एक व्यक्ति जो चित्त शुद्धि करता हैं वह बुद्धत्व का हकदार हैं. जब कि ईसाई मानते हैं कि मुक्ति केवल उनके लिए हैं जो येशु मे विश्वास रखते हैं. मुझे लगता हैं कि इतना भेद काफी हैं. जबकि, बाईबल के सुंदर वचन हैं:

     “अगर मैं मनुष्यों एवं देवदुतों की वाणी कहता हूँ पर मुझ में प्रेम नही हैं, तो मैं केवल नगाडे का शोर या झांज हूँ. अगर मुझे भविष्य व रहस्यों का ज्ञान हैं, पहाडों को गिराने का विश्वास हैं, पर मुझ में प्रेम नही हैं, तो मैं कुछ नही हूँ. अगर मैं गरीबों को दान करता हूँ, अपना शरीर भी अग्नि को चढाता हूँ, पर मुझ में प्रेम नही हैं, तो मैंने कुछ नही पाया. प्रेम संयमी हैं, प्रेम करूणा हैं, यह इर्षा नही करता, शेखी नही बघारता, अभिमानी नही होता. प्रेम कठोर नही होता, आत्मतुष्टी नही खोजता, आसानी से क्रोधित नही होता, और दुर्व्यवहार को याद नही रखता. प्रेम दुष्टता नही करता बल्कि सत्य का उत्सव मनाता हैं. यह सदैव संरक्षण देता, भरोसा देता और सातत्य रखता हैं.” Cor. 13-7

यही बुद्ध की शिक्षा हैं – हमारे ह्रदय की गुणवता अपनी साई अतिभौतिक शक्तियों, भविष्य को जानने की क्षमता, श्रद्धा बल व विशिष्ट गुणों से भी महत्वपूर्ण होती हैं. तो बौद्ध धर्म व ईसाई धर्म के सत्य की संकल्पना व सिद्धांतो मे निश्चित फर्क हैं. मगर ह्रदय की गुणवता, नैतिकता और आचरण में वे काफी समान हैं. यही बात बौद्ध धर्म और बाकी धर्मों के बारे में कही जा सकती हैं.

सवाल: क्या बौद्ध धर्म वैज्ञानिक हैं?

जवाब: इस सवाल का जवाब देने से पहले विज्ञान की परिभाषा करना बेहतर होगा. शब्दकोष के अनुसार विज्ञान का अर्थ होता हैं, ऐसा ज्ञान जो प्रणाली मे बंध सकता हो, जो तथ्यों को देख परख कर सर्वमान्य/साधारण नैसर्गिक नियमों मे विशद कर सकता हो, एक ऐसे ज्ञान की शाखा या कोई भी सही अध्ययन.

बौद्ध धर्म के कुछ पहलु शायद इस परिभाषा मे न आते हो मगर चार आर्य सत्य; जो कि बुद्ध की केंद्रिय शिक्षा हैं, इस परिभाषा मे निश्चित समाते हैं.

पहला आर्य सत्य, दु:ख, एक ऐसा अनुभव हैं जो परिभाषित किया जा सकता हैं, अनुभव किया जा सकता हैं और नापा जा सकता हैं.

दूसरा आर्य सत्य, दु:ख का कारण तृष्णा हैं इसी तरह परिभाषित किया जा सकता हैं, अनुभव किया जा सकता हैं और नापा जा सकता हैं. यहा दु:ख को अतिभौतिक संकल्पना या परीकल्पना के माध्यम से नही समझाया हैं.

तीसरा आय सत्य दु:ख निवारण, दु:ख के कारणों का अंत करने से होता हैं, न कि पूजा, भक्ति या सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर निर्भर होने से. यह बात प्रमाणभूत हैं.

चौथा आर्य सत्य, मार्ग आर्यसत्य, निर्भर करता हैं विशिष्ट आचरन पर, न कि अतिभौतिकवाद पर. और इस आचरण की जांच हो सकती हैं. बौद्ध धर्म ईश्वर की कल्पना को नकारता हैं, ठीक विज्ञान की तरह, और अस्तित्व के परीचालन को नैसर्गिक नियमों से होता हुआ देखता हैं. यह सारी बाते वैज्ञानिक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं. इस पर भी बुद्ध के इस कथन मे हमने अंधानुकरण न करके प्रशन, चिकित्सा, खोज व अनुभव को आधार रखना, निश्चित ही वैज्ञानिक हैं. बुद्ध के प्रसिद्ध कलामसुत्र के अनुसार:

प्रथा या परंपरा को न माने, खबरे या शास्त्रों की न माने, जनमानस या तर्क की न माने, किसी मत या व्यक्ति के प्रभाव की न माने और न इसलिय माने की यह हमारे गुरु हैं. पर जब आप स्वयं जानते हैं कि, यह अच्छा हैं, प्रशंसनीय हैं, श्रेष्ठ जनों न इसे सराहा हैं और जिसका अभ्यास एवं आचरण करने पर सुख मिलता हैं, तब उसे स्वीकारे.” A.I, 188

अतएव हम सकते हैं कि बौद्ध धर्म भले ही पूर्ण रुपसे विज्ञानिक ना हो पर इसमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शक्ति हैं. और यह निश्चित ही बाकि धर्मों के मुकाबले ज्यादा वैज्ञानिक हैं बीसवी सदी के जाने माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आईंस्टीन ने बौद्ध धर्म के बारे मे कहा हैं:

भविष्य मे धर्म वैश्विक होगा. वह व्यक्तिरूप ईश्वर से परे होगा और दुराग्रह व दैववाद को नकारनेवाला होगा. जीवन के सारे नैसर्गिक व धार्मिक अनुभवों से उत्पन्न होती आध्यात्मिकता इसका आधार होगी. बौद्ध धर्म इस बात का जवाब हैं. अगर कोई धर्म आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सही साबित होता हैं, तो वह बौद्ध धर्म हैं.”

सवाल: मैंने सुना हैं कि बौद्ध धर्म की शिक्षा को मध्यम मार्ग कहा जाता हैं. इसका क्या मतलब हैं?

जवाब: बुद्ध ने अपने आर्य अष्टांगिक मार्ग को दूसरा नाम दिया,मझ्झीम पतीपद, जिसका अर्थ होता हैं, ‘मध्यम मार्ग’. यह महत्वपूर्ण हैं कि हम केवल मार्ग पर चले ही नही बल्कि विशिष्ट ढंग से भी चले. लोग धार्मिक नियमों व आचरण पद्धतियों के प्रति सख्त होकर अंत में धार्मिक अतिरेकी हो सकते हैं. बौद्ध धर्म मे नियम व आचरण को संतुलित तथा अतियों को टालते हुये करना होता हैं. रोमन्स कहते थे, हर कार्य में संयमन हो और बौद्ध इससे पूर्ण्त: सहमत होंगे.

सवाल: मैंने पढा हैं कि बौद्ध धर्म हिंदू धर्म की शाखा हैं. क्या यह सच हैं?

जवाब: नही. यह सच नही हैं. हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों भारत में जन्मे हैं और इनकी नैतिक संकल्पना काफी समान हैं, और दोनों समान सब्दावली जैसे कर्म, समाधी, निर्वाण आदी का इस्तेमाल करते हैं. इससे कुछ लोगों को लगा कि वे एक हैं या उनमे बहुत समानता हैं. पर जब हम सतही समानता से भी गहरे देखते हैं तब पता चलता हैं कि दोनों धर्मों मे भेद साफ हैं. उदाहरण के तौर पर हिंदू धर्म परमेश्वर में विश्वास रखता हैं. जबकि बौद्ध धर्म परमात्मा मे विश्वास नही रखता. हिंदुओं के सामाजिक तत्वज्ञान मे जाती प्रथा केंद्रीयभूत हैं. जबकि बौद्ध धर्म इसे सर्वथा अमान्य करता हैं. हिंदू धर्म मे कर्मकांड से शुद्धी करने पर जोर हैं जबकि बौद्ध धर्म मे उसे कोई स्थान नही हैं. बौद्ध शास्त्रों मे बुद्ध को ब्राहमणों की आचरण पद्धती का खंडन करते हुये दिखाया हैं और हिंदू धर्म, बुद्ध की कुछ शिक्षाओं की आलोचना करता था. अगर हिंदु धर्म और बौद्ध धर्म एक होता तो यह नही घटता.

सवाल: पर क्या बुद्ध न हिंदू धर्म से कर्म सिद्धांत को नही उठाया?

जवाब: हिंदू धर्म, कर्म सिद्धांत और पुनर्जन्म सिखाता हैं. हिंदू की यह दोनों शिक्षाएँ बौद्ध शिक्षाओं से भिन्न हैं. उदाहरण के तौर पर हिंदू कहता हैं कि हम कर्म से बने हैं जबकि बौद्ध कहता हैं कि कर्म हमे संस्कारीत करता हैं. हिंदू मानता हैं कि, आत्मा एक जीवन से दूसरे जीवन मे जाती हैं. जबकि बौद्ध इसे अमान्य करते हुये कहता हैं कि लगातार बदलने वाली मानसिक ऊर्जा पुनर्जन्म लेती हैं. कर्म और पुनर्जन्म पर इन दो धर्मों मे यह कुछ भेद हैं. फिर भी यदि हिंदू और बौद्ध की शिक्षा एक जैसी होती तो भी बुद्ध ने इसे हिंदू धर्म से उठाया ऐसा नही कहा जा सकता.

कभी ऐसा होता हैं, कि दो व्यक्ति स्वतंत्र रूप मे एक खोज करते हैं. इसका अच्छा उदाहरण हैं उत्क्रांती की खोज. 1858 में अपनी किताब “प्रजातीयों का उद्गम” छपने के पहले की चार्ल्स डार्विन ने पाया कि एक दूसरे व्यक्ति अल्फ्रेड रसेल वलेस ने ठीक उसी उत्क्रांती की कल्पना की थी. डार्विन व वलेस ने एक दूसरे की खोज की नकल नही की थी. बल्कि दोनों ने एक ही प्रक्रिया का अध्ययन कर समान निष्कर्ष निकाले थे. वैसे ही अगर हिंदू और बौद्ध की कर्म और पुनर्जन्म की संकल्पना समान हैं तो इसे नकल नही कहा जा सकता. सच्चाई यह हैं कि, ध्यान में हिंदू संयासियों को कर्म और पुनर्जन्म की जो धुँधली झलक मिलि थी, बुद्ध ने कालांतर मे उसे गहरा और साफ कर दिया.