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अरहन्तवग्गो

गतद्धिनो विसोकस्स, विप्पमुत्तस्स सब्बधि
सब्बगन्थप्पहीनस्स, परिळाहो न विज्जति.

हिंदी: जिसकी यात्रा पूरी हो गई है, जो शोक रहित है, सर्वथा विमुक्त है, जिसकी सभी ग्रंथियाँ कट गई है, उसके लिए (कायिक और चैतसिक) संताप (नाम की कोई चीज) नहीं है.

उय्युञ्जन्ति सतीमन्तो, न निके ते रमन्ति ते
हन्साब पल्ललं हित्वा, ओक मोकं जहन्ति ते.

हिंदी: स्मृतिमान उद्योग करते रहते हैं, वे घर में रमण नहीं करते. जैसे हंस क्षुद्र जलाशय को छोड़ कर चले जाते हैं, वैसे ही वे घर-बार (अथवा सभी ठौर-ठिकानों को) छोड़ देते हैं.

येसं सन्निचयो नत्थि, ये परिञ्ञातभोजना
सुञ्ञतो अनिमित्तो च, विमोक्खो येसं गोचरो
आकासे व सकुन्तानं, गति तेसं दुरन्नया.  

हिंदी: जो (कर्मों और प्रत्ययों का) संचय नहीं करते, जिन्हे (अपने) आहार (की मात्रा का) पूरा ज्ञान है, शून्यतास्वरूप तथा निमित्तरहित निर्वाण जिनकी गोचरभूमि है, उनकी गति वैसे ही अज्ञेय रहती है जैसे आकाश में पक्षियों की (गति).

यस्सासवा परिक्खीणा, आहारे च अनिस्सितो
सुञ्ञतो अनिमित्तो च, विमोख्खो यस्स गोचरो
आकासे व सकुन्तानं, पदं तस्स दुरन्नयं.

हिंदी: जिसके आश्रय (चित्त-मल) पूरी तरह से क्षीण हो गये हैं, जो आहार में आसक्त नहीं है, शून्यतास्वरूप तथा निमित्तरहित निर्वाण जिनकी गोचरभूमि है, उनकी गति वैसे ही अज्ञेय रहती है जैसे आकार में पक्षियों कि (गति).

यस्सिन्द्रियानि समथङ्गतानि, अस्सा यथा सारथिना सुदन्ता
पहीनमानस्स अनासवस्स, देवापि तस्स पिहयन्ति तादिनो.

हिंदी: सारथी द्वारा सुदातं (सुशिक्षित) घोड़ों के समान जिसकी इंन्द्रियां शांत हो गयी हैं, जिसका अभिमान विगलित हो गया है, जो आश्रवरहित है, देवगण भी वैसे (व्यक्ति) की स्पृहा करते हैं.

पथविसमो नो विरुज्झति, इन्दखिलुपमो तादि सुब्बतो
रहदोव अपेतकद्दमो, संसारा न भवन्ति तादिनो.

हिंदी: सुंदर व्रतधारी अर्हत (तादि) पृथ्वी के समान क्षुब्थ न होने वाला और इंद्रकील के समान अंकप्य होता है. वैसे (व्यक्ति) को कर्दम रहित जलाशय की भांति संसार (-मल) नहीं होते.

सन्तं तस्स मनं होति, सन्ता वाचा च कम्मच
सम्मदञ्ञा विमुत्तस्स, उपसन्तस्स तादिनो.

हिंदी: सम्यक ज्ञान द्वारा मुक्त हुए उपशांत (अरहंत) का मन शांत हो जाता है, और वाणी तथा कर्म भी शांत हो जाते है.

अस्सद्धो अकत्ञ्ञू च, सन्धिच्छेदो च यो नरो
हतावकासो वन्तासो, स वे उत्तमपोरिसो.

हिंदी: जो नर (अंध-) श्रद्धारहित, निर्वाण का जानकार (भव-संसरण की) संधि का छेदन किये हुए, (पुनर्जन्म की) संभावनारहित और (सर्वप्रकार की) आसाएं त्यागे हुए हो, वह नि:संदेह उत्तम-पुरुष होता है.

गामे वा यदि वारञ्ञे, निन्ने वा यदि वा थले
यत्थ अरहन्तो विहरन्ति, तं भूमिरामणेय्यकं.

हिंदी: गांव हो य जंगल, भूमि नीची हो या (ऊंची), जहां (कहीं) अरहंत विहार करते हैं, वह भूमि रमणीय होती है.

रमणीयानि अरञ्ञानि, यत्थ न रमती जनो
वीतरागा रमिसन्ति, न ते कामगवेसिनो.

हिंदी: रमणीय वन जहां (सामान्य) व्यक्ति रमण नहीं करते, (वहां) वीतराग (क्षीणाश्रव) रमण करेंगे (क्योंकि) वे कामभोगों की खोज में नही रहते.


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— भवतु सब्ब मंगलं—

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