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अ‍त्तवग्गो

अत्तानञ्चे पियं जञ्ञा, रक्खेय्य नं सुरक्खितं
तिण्णं अञ्ञतरं यामं, पटिजग्गेय्य पण्डितो.

हिंदी: यदि अपने को प्रिय समझते हो तो उसको स्रुरक्षित रखो, समझदार (व्यक्ति) (जीवन के) तीन प्रहरों (अवस्थाओं – युवास्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था) में से (किसी) एक में (तो) अवश्य सचेत हो.

 अत्तानमेव पठमं, पतिरुपे निवेसये
अथञ्ञमनुसासेय्य, न किलिस्सेय्य पण्डितो.

हिंदी: पहले अपने आपको ही उचित (कार्य) में लगायें, फिर (किसी) दूसरे को उपदेश करें, (तो) पंडित) क्लेश को प्राप्त नहीं होता.

अत्तानं चे तथा कयिरा, यथाञ्ञमनुसासति
सुदन्तो वत दमेथ, अत्ता हि किर दुद्यमो.

हिंदी: यदि पहले अपने को वैसा बनाये जैसा कि दूसरों को उपदेश देता है, तो अपने आपको सुदांत करने वाला (भलीभांति वश में करने वाला) ही दूसरो का दमन कर सकता है.

अत्ता हि अत्तनो नाथो, कोहि नाथो परो सिया
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं.

हिंदी: मनुष्य (व्यक्ति) अपना स्वामी आप है, भला दूसरा कौन स्वामी हो सकता है? अपने आपको भली-भांति वश में करके (प्रज्ञा द्वारा ही) यह दुर्लभ (स्वामित्व) प्राप्त होता है.

अत्तना हि कतं पापं, अत्तजं अत्तसम्भवं
अभिमत्थति दुम्मेधं, वजिरं वस्ममयं मणिं.

हिंदी: अपने से पैदा हुआ, अपने से उत्पन्न, अपने द्वारा किया गया पाप (-कर्म) (इसे करने वाले) दुरबुद्धि को उसी प्रकार पीड़ित करता है जिस प्रकार कि पाषाणमय मणि को वज्र.

यस्स अच्चन्तदुस्सील्यं, मालुवा सालमिवोत्थतं
करोति सो तथत्तानं. यथा नं इच्छती दिसो.

हिंदी: शाल वृक्ष पर फैली हुई मालुवा लता के समान जिसका दुराचार खूब (फैलाअ हुआ है), वह अपने आपको वैसा ही बना लेता है जैसा उसके शत्रू चाहते हैं.

सुकरानि असाधूनि, अत्तनो अहितानि च
यं वे हितञ्च साधुञ्च, तं वे परमदुक्करं.

हिंदी: बुरे और अपने लिए अहितकारी (काम) करना सहज है, (किंतु) भला और हितकारी (काम) करना बड़ा दुष्कर हैं.

यो सासनं अरहतं, अरियानं धम्मजीविनं
पटिक्कोसति दुम्मेधो, दिट्ठिं निस्साय पापिकं
फलानि कट्ठकस्सेव, अत्तघाताय फल्लति.

हिंदी: धम्म का जीवन जीने वाले, आर्य, अरहतो के शासन (=शिक्षा) कि जो दुबुद्धि पापपूर्ण दृष्टि के कारण निंदा करता है, वह बांस के फल (फूल) की भांति आत्म-हत्या के लिए (ही) फलता (फूलता) है.

अत्तना हि कतं पापं. अत्तना संकि लिस्सति
अत्तना अकतं पापं, अत्तनाव विसुज्झति
सुद्धी असुद्धि पच्चत्तं, नाञ्ञो अञ्ञं विसोधये.

हिंदी: अपने द्वारा किया गया पाप ही अपने को मैला करता है, स्वयं पाप न करे तो आदमी आप ही विशुद्द बना रहे, शुद्धि-अशुद्धि तो प्रत्येक मनुष्य की अपनी-अपनी ही है. (अपने-अपने ही अच्छे-बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप है) कोई दूसरा भला किसी दूसरे को कैसे शुद्ध कर सकता है? (कैसे मुक्त कर सकता है?)

अत्तदत्थं प्रत्थेन, बहुनापि न हापये
अत्तदत्थमभिञ्ञाय, सदद्थपसुतो सिया.

परार्थ के लिए आत्मार्ह्त को बहुत ज्यादा भी न छोड़े, आत्मार्ह्त को जानकर सदर्थ में लगा रहे.


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— भवतु सब्ब मंगलं —

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