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जरावग्गो

कोनु हासो किमानन्दो, निच्चं पज्जलिते सति
अन्धकारेन ओनद्धा, पदीपं न गवेसथ.

हिंदी: जहां प्रतिक्षण (सबकुछ) जल ही रहा हो, वहां कैसी हँसी? कैसा आनंद? (कैसा आमोद? कैसा प्रमोद?) ऐ (अविद्यारुपी) अंधकार से घिरे हुए (भोले लोगो!) तुम (ज्ञानरूपी) प्रकाश-प्रदीप की खोज क्यों नहीं करते?

पस्स चित्तकतं बिम्बं, अरुकायं समुस्सितं
आतुरं बहुसङकप्पं, यस्स नत्थि धुवं ठिटि.

हिंदी: देखो (इस) चित्रित शरीर को जो व्रणों से युक्त, फूला हुआ, रोगी और नाना (प्रकार के) संकल्पो से युक्त है (और) जो सदा बना रहने वाला नहीं है.

परिजिण्नमिदं रूपं, रोगनीळं पभङगुरं
भिज्जति पूतिसन्देहो, मरणन्तञ्हि जीवितं.

हिंदी: यह शरीर जीर्ण-शीर्ण, रोग का घर और नितांत भंगुर है. सड़ायंध से भरी हुई (यह) देह टुकड़े-टुकड़े हो जाती है; जीवन मरणांतक जो ठहरा!

यानिमानि अपत्थानि, अलाबूनेव सारदे
कापोतकानिअट्ठीनि, तानि दिस्वान कारति.

हिंदी: शरद काल की फेंकी गयी (अपथय) लौकी के समान (कुम्हलाये हुए मृत शरीर को देख कर) या कबूतरों के से वर्ण वाली (शमशान में पड़ी) हड्डियों को देख कर किसको (इस देह से) अनुराग होगा?

अट्ठीनं नगरं कतं, मंसलोहितलेपनं
यथ जरा च मच्चु च, मानो मक्खो च ओहितो.

हिंदी: यह हड्डियों का नगर बना है जो मांस और अर्क्त से लेपा गया है; जिसमें जरा, मृत्यु, अभिमान और म्रक्ष (डाह) छिपे हुए हैं.

जीरन्ति वे राजरथा सुचित्ता, अथो सरीरम्पि जरं उपेति
सतञ्च धम्मो न जरं उपेति, सन्तो हवे सब्भि पवेदयन्ति.

हिंदी: रंग-बिरंगे सुचित्रित राजरथ जीर्ण हो जाते हैं और यह शरीर भी जीर्णता को प्राप्त हो जाता है, (परंतु) संतों (बुद्धों) का धम्म जीर्ण नहीं होता (तरोताजा बना रहता है), संतजन (बुद्ध) संतों से ऐसा (ही) कहते हैं.

अप्पस्सुतायं पुरिसो, बलिबद्दोव जीरति
मंसानि तस्स वड्ढन्ति, पञ्ञा तस्स न वड्ढति.

हिंदी: अज्ञानी पुरुष बैल के समान जीर्ण होता है, उसका मांस बढ़ता है, प्रज्ञा नहीं.

अनेकजातिसंसारं, सन्धाविस्सं अनिब्बिसं
गहकारं गवेसन्तो, दुक्खा जाति पुनप्पुनं.

हिंदी: (इस काया-रुपी) घर को बनाने वाले की खोज में (मैं) बिना रुके अनेक जन्मों तक (भव-) संसरण करता रहाअ, किंतु बार-बार दु:ख (-मय) जन्म ही हाथ लगे.

गहकारक दिट्ठोसि, पुन गेहं न काहसि
सब्बा ते फासुका भग्गा, गहकूटं विसङखतं
विसङखारगतं चित्तं, तण्हानं खयमज्झगा.

हिंदी: ऐ घर बनाने वाले! (अब) तू देख लिया गया है, (अब) फिर (तू) (नया) घर नहीं बना सकता, तेरी सारी कड़ियां टूट गयी हैं और घर का शिखर भी विशृंखलित हो गया है, चित्त पूरी तरह संस्काररहित हो गया है और तृष्णाओं का क्षय (निर्वाण) प्राप्त हो गया है.

अचरित्वा ब्रहम्चरियं, अलद्धा योब्बने धनं
जिण्णकोञ्चाव झायन्ति, खीणम्च्छेव पल्लले.

हिंदी: ब्रहमचर्य का पालन किये बिना (अथवा) यौवन में धन कमाये बिना (लोग वृद्धावस्था में) मत्स्यहीन जलाशय में बूढ़े (जीर्ण) क्रौंच पक्षी के समान घुट-घुट कर मरते हैं.

अचरित्वा ब्रह्मचरियं, अलद्धा योब्बने धनं
सेन्ति चापातिखीणाव, पुराणानि अनुत्थुनं.

हिंदी: ब्रह्मचर्य का पालन किये बिना (अथवा) यौवन में धम कमाये बिना (लोग) वृद्धावस्था में धनुष से छोड़े गये (बाण) की भांति पुरानी बातों को याद कर अनुताप करते हुए बिलखते हुए सोते हैं.


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— भवतु सब्ब मंगलं —

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