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दण्डवग्गो

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्चुनो
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये.

हिंदी: सभी दंड से डरते है, सभी को मृत्यु से भय लगता है. (अत: सभी को) अपने जैसा समझ कर न (किसी की) हत्या करें, न हत्या करने के लिए प्रेरित करें.

सब्बे तसन्ति डण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये.

हिंदी: सभी दंड से डरते है, जीवित रहना सबको प्रिय लगता है. (अत: सभी को) अपने जैसा समझ कर न (किसी की) हत्या करें, न हत्या करने के लिए प्रेरित करें.

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति
अत्तनो सुखमेसानो, पेछ सो न लभते सुखं.

हिंदी: जो सुख चाहने वाले प्राणियों को, अपने सुख की चाह से, दण्द से विहिंसित करता है (कष्ट पहुँचाता है), वह मर कर सुख नहीं पाता.

सुखाकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति
अत्तनो सुखमेसानो, पेछ सो लभते सुखं.

हिंदी: जो सुख चाहने वाले प्राणियों को, अपने सुख की चाह से, दंड से विहिंसित नहीं करता (कष्ट नहीं पहुँचाता है), वह मर कर सुखा पाता है.

मावोच फरुसं कञ्चि, वुत्ता पटिवदेय्यु तं
दुक्खा हि सारम्भक था, पटिदण्डा फुसेय्यु तं.

हिंदी: तुम किसी को कठोर वचन मत बोलो, बोलने पर (दूसरे भी) तुम्हे वैसे ही बोलेंगे, क्रोध या विवाद भरी वाणी दु:ख है, उसके बदले में तुम्हें दंड मिलेगा.

सचे नेरेसि अत्तानं, कंसो उपहतो यथा
एस पत्तोसि निब्बानं, सारम्भो ते न विज्जति.

हिंदी: यदि (तुम) अपने आपको टूते हुए कांसे के समान नि:शब्द कर लो, तो (समझो तुमने) निर्वाण पा लिया (क्योंकि) तुममें कोई विवाद नहीं रह गया, कोई प्रतिवाद नहीं रह गया.

यथा दण्डेन गोपालो, गावो पाजेति गोचरं
एवं जरा च मच्चु च, आयुं पाजेन्ति पाणिनं.

हिंदी: जैसे ग्वाला लाठी से गायों को चरागाह में हांक कर ले जाता है, वैसे ही बुढ़ापा और मृत्यु प्राणियों की आयु को हांक कर ले जाते हैं.

अथ पापानि कम्मानि, करं बालो न बुज्झति
सेहि कम्मेहि दुम्मेधो, अग्गिदड्ढोव तप्पति.

हिंदी: बाल बुद्धि वाला मूर्ख (व्यक्ति) पापकर्म करते हुए होश नहीं रखता, (परंतु समय पाकर) अपने उन्हीं कर्मों के कारण वह दुर्मेध (दुर्बुद्धि) ऐसे तपता है जैसे आग से जला हो.

यो दण्डेन अदण्डेसु, अप्पदुट्ठेसु दुस्सति
दसन्नमञ्ञतरं ठानं, खिप्पमेव निगच्छति.

हिंदी: जो दंडरहितों (क्षीणाश्रवों) को दंड से (पीड़ित करता है) या निर्दोष को दोष लगाता है, उसे इन दस बातों में से कोई एक बात शीघ्र ही होती है –

वेदनं फरुसं जानिं, सरीरस्स च भेदनं
गरुकं वापि आबाधं, चित्तक्खेपञ्च पापुणे.

हिंदी: तीव्र वेदना, हानि, अंगभंग, बड़ा रोग, चित्तविक्षेप (उन्माद).

राजतो वा उपसग्गं, अब्भक्खानञ्च दारुणं
परिक्खयञ्च ञातीनं, भोगानञ्च पभङगुरं.

हिंदी: राजदंड, कड़ी निंदा, संबंधियों का विनाश, भोगों का क्षय, अथवा

अथ वास्स अगारानि, अग्गि डहति पावको
कायस्स भेदा दुप्पञ्ञो, निरयं सोपपज्जति.

हिंदी: इसके घर को आग जला डालती है. शरीर छूटने पर वह दुष्प्रज्ञ नरक में उत्पन्न होता है.

न नग्गचरिया न जटा न पङका, नानासकाथण्डिलसायिकावा
रजोजल्लं उक्कु टिकप्पधानं, सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकङखं.

हिंदी: जिस मनुष्य के संदेह समाप्त नहीं हुए है उसकी शुद्धि न नंगे रहने से, न जटा (धारण करने) से, न कीचड़ (लपेटने) से, न उपवास करने से, न कड़ी भूमि पर सोने से, न कादा पोतने से और न उकडूं बैठने से ही होती है.

अलङकतो चेपि समं चरेय्य, सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी
सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं, सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खु.

हिंदी: (वस्त्र, आभूषण आदि से) अलंकृत रहते हुए भी यदि कोई शांत, दांत, स्थिर (नियंत्रित), ब्रह्म्चारी है तथा सारे प्राणियों के प्रति दंड त्याग कर समता का आचरण करता है, तो वह ब्राह्म्ण है, श्रमण है, भिक्खु है.

हिरीनिसेधो पुरिसो, कोचि लोकस्मि विज्जति
यो निन्दं अपबोधेति, अस्सो भद्रो कसामिव.

हिंदी: संसार में कोई (कोई) पुरुष ऐसा भी होता है जो (स्वयं ही) लज्जा के मारे निषिद्ध (कर्म) नहीं करता, वह निंदा को नहीं सह सकता, जैसे सधा हुआ घोड़ा चाबुक को (नहीं सह सकता).

अस्सो यथा भद्रो कसानिविट्ठो, आतापिनो संवेगिनो भवाथ
सद्धाय सीलेन च वीरियेन च, समाधिना धम्मविनिच्छयेन च
सम्पन्नविज्जाचरणा पतिस्सता, पहिस्सथ दुक्खमिदं अनप्पकं.

हिंदी: चाबुक खाये उत्तम होड़े के समान उद्योगशील और संवेगशील बनो, श्रद्धा, शील, वीर्य, समाधी और धम्म-विनिश्चय से युक्त हो विद्या और आचरण से संपन्न और स्मृतिमान बन इस महान दु:ख (-समूह) का अंत कर सकोगे.

उदकञ्हिनयन्ति नेत्तिका, उसुकारानमयन्ति तेजनं
दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति सुब्बता.

हिंदी: पानी ले जाने वाले (जिधर चाहते हैं उधर ही) पानी को ले जाते हैं, बाण बनाने वाले बाण को (तपा कर) सीधा करते हैं, बढ़ई लकड़ी को (अपनी रुचि के अनुसार) सीधा या बांका करते हैं, और सदाचार-परायण अपना (ही) दमन करते हैं.


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— भवतु सब्ब मंगलं —

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