HomeDhammapadबुद्धवग्गो

बुद्धवग्गो

यस्स जितं नावजीयति, जितं यस्स नो याति कोचिलोके
तं बुद्धमन्नतगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ.

हिंदी: जिसकी विजय को अविजय में नहीं पलटा जा सकता, जिसके द्वारा विजित (राग, द्वेष, मोहादि) वापस संसार में नहीं आते (पुन: नहीं बांधते), उस अपद अन्नतगोचर बुद्ध को किस उपाय से मोहित (प्रलुब्ध) कर सकोगे?  

यस्स जालिनी विसत्तिका, तण्हा नत्थि कुहिञ्चि नेतवे
तं बुद्धमन्नतगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ.

हिंदी: जिसकी जाल फैलाने वाली विषाक्त तृष्णा कहीं ले जाने में समर्थ नहीं रही, उस अनंतगोचर बुद्ध को किस उपाय से मोहित (प्रलुब्ध) कर सकोगे?

ये झानपसुता धीरा नेक्खम्मूपसमे रता
देवापि तेसं पिहयन्ति, सम्बुद्धानं सतीमतं.

हिंदी: जो पंडित (जन) ध्यान (करने) में लगे रहते हैं, और त्याग और उपशमन में लगे रहते हैं, उन स्मृतिमान संबुद्धों की देवता भी प्रशंसा करते हैं.

किच्छोमनुस्सपटिलाभो, किच्छं मच्चान जीवितं
किच्छं सद्धम्मस्सवनं, किच्छो बुद्धानमुप्पादो.

हिंदी: मनुष्य (योनि) प्राप्त होना कठिन है, मनुष्यों का जिवित रहना कठिन है, सद्धम्म का श्रवण (कर पाना) कठिन है और बुद्धों का उत्पन्न होना कठिन है.

सब्बपापस्स अकरणं. कुसलस्स उपसम्पदा
सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान सासनं.

हिंदी: सभी पापकर्मों (अकुशल कर्मों) को न करना, पुण्यकर्मों की संपदा संचित करना, (पांच नीवरणों से) अपने चित्त को परिशुद्ध करना (धोते रहना) – यही बुद्धों की शिक्षा है.

खन्ती परमं तपो तितिक्खा, निब्बानं परमं वदन्ति बुद्धा
न हि पब्बजितो परुपघाती, न समणो होति परं विहेठयन्तो.

हिंदी: सहनशीलता और क्षमाशीलता परम तप है, बुद्ध (जन) निर्वाण को उत्तम बतलाते हैं. दूसरे का घात करने वाला प्रव्रजित नहीं होता और दूसरे को सताने वाला श्रमण नहीं हो सकता.

अनूपवादो अनूपघातो, पातिमोक्खे च संवरो
मत्तञ्ञुता च भत्तस्मिं, पन्तञ्च सयनासनं
अधिचिते च आयोगो, एतं बुद्धान सासनं.

हिंदी: निंदा न करना, घात न करना, प्रातिमोक्ष (भिक्खु-नियमों) द्वारा अपने को सुरक्षित रखना. (अपने) आहार की मात्रा का जानकार होना, एकातं में सोना-बैठना और चित्त को एकार करने के र्पयत्न में जुटना – यह (सभी) बुद्धों की शिक्षा है.

न कहापणवस्सेन, तित्ति कामेसु विज्जति
अप्पस्सादा दुखा कामा, इति विञ्ञाय पण्डितो.

हिंदी: स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा से (भी) काअमभोगों की तृप्ति नहीं हो सकती, यह जान कर कि कामभोग अल्प आस्वाद वाले और दु:खद होते हैं, (कोई) पंडित –

अपि दिब्बेसु कामेसु, रतिं सो नाधिगच्छति
तण्हक्खयरतो होति, सम्मासम्बुद्धसावको.

हिंदी: दैवी कामभोगों में भी आनंद प्राप्त नहीं करता. सम्यक संबुद्ध का श्रावक तृष्णा का क्षय करने में लगा रहता है.

बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बतानि वनानि च
आरामरुक्खचेत्यानि, मनुस्सा भयतज्जिता.

हिंदी: मनुष्य भय के मारे पर्वतों, वनों, उद्द्यानों, वृक्षों, चैत्यों – आदि बहुतों की शरण में जाते हैं,

नेतं खो सरणं खेमं, नेतं सरणमुत्तमं
नेतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति.

हिंदी: (परंतु) यह शरण मंगलकारी नहीं है, यह शरण उत्तम हीं है, इस शरणों को पाकर सभी दु:खों से छुटकारा नहीं होता.    

यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च, सङ्घस्स सरणं गतो
चत्तारि अरियसच्चानि, सम्मप्पञ्ञाय पस्सति.

दुक्खं दुक्खसमुप्पादं, दुक्खस्स च अतिक्क मं
अरियं चट्ठङ्गिकं मग्गं, दुक्खूपसमगामिनं.

एतं खो सरणं खेमं, एतं सरणमुत्तमं
एतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति.

हिंदी: जो बुद्ध, धम्म और संघ की शरण गया, जो चार आर्य सत्यों – दु:ख, दु:ख की उत्पत्ति, दु:ख से मुक्ति और मुक्तिगामी आर्य अष्टांगिक मार्ग – को सम्यक प्रज्ञा से देखता है, यही मंगलदायक शरण है, यही उत्तम शरण है, इसी शरण को प्राप्त कर (व्यक्ति) सभी दु:खों से मुक्त होता है.

दुल्लभो पुरिसाजञ्ञो, न सो सब्बत्थ जायति
यत्थ सो जायति धीरो, तं कुलं सुखमेधति.

हिंदी: श्रेष्ठ पुरुष का जन्म दुर्लभ होता है, वह सब जगह पैदा नहीं होता, वह (उत्तम प्रज्ञा वाला) धीर (पुरुष) जहां उत्पन्न होता है उस कुल में सुख की वृद्धि होती है.

सुखो बुद्धानमुप्पादो, सुखा सद्धम्मदेसना
सखा सङ्घस्स सामग्गी, समग्गानं तपो सुखो.

हिंदी: सुखदायी है बुद्धों का उत्पन्न होना, सुखदायी है सद्धर्म का उपदेश, सुखदायी है संघ की एकता, सुखदायी है एक साथ तपना,

पूजारहे पूजयतो, बुद्धे यदि व सावके
पपञ्चसमतिक्कन्ते, तिण्णसोक परिद्दवे.

हिंदी: पूजा के योग्य बुद्धों अथवा उनके श्रावकों – जो (भव-) प्रपंच का अतिक्रमण कर चुके हैं और शोक तथा भय को पार कर गये हैं –

ते तादिसे पूजयतो, निब्बुते अकुतोभये
न सक्कापुञ्ञं सङ्खातुं, इमेत्तमपि केनचि.

हिंदी: निर्वाणप्राप्त, निर्भय हुए – ऐसे लोगों की पूजा केपुण्य का परिमाण इतना होगा, यह नहीं कहा जा सकता.


ओडियो सुने


 — भवतु सब्ब मंगलं —

Must Read

spot_img