HomeDhammapadसुखवग्गो

सुखवग्गो

सुसुखं वत जीवाम, वेरिनेसु अवेरिनो
वेरिनेसु मनुस्सेसु, विहराम अवेरिनो.

हिंदी: वैरियों के बीच अवैरी होकर, अहो! हम बड़े सुख से जी रहे हैं. वैरी मनुष्यों के बीच हम अवैरी होकर विचरण करते हैं.

सुसुखं वत जीवाम, आतुरेसु अनातुरा
आतुरेसु मनुस्सेसु
, विहराम अनातुरा.

हिंदी: (तृष्णा से) आतुर (व्याकुल) लोगों के बीच, अहो! हम अनातुर (अनाकुल) रह कर बड़े सुख से जी रहे हैं. आतुर (रोगी) मनुष्यों में हम अनातुर (नीरोग) रह कर विचरण करते हैं.

सुसुखं वत जीवाम, उस्सुकेसु अनुस्सुका
उस्सुकेसु मनस्सेसु
, विहराम अनुस्सुका.

हिंदी: (कामभोगों के प्रति) आसक्त (लोभी) लोगों के बीच हम अनासक्त (अलोभी) होकर, अहो! हम बड़े सुख से जी रह हैं. लोभी के बीच हम निर्लोभी होकर विचरण करते हैं.

सुसुखं वत जीवाम, येसं नो नत्थि किञ्चनं
पीतिभक्खा भविस्साम
, देवा आभस्सरा यथा.

हिंदी: जिनके पास कुछ नहीं है, अहो! (वैसे हम) कैसे बड़े सुख से जी रह हैं. आभास्वर देवताओं के समान हम प्रीति का (ही) भोजन करने वाले होंगे.

जयं वेरं पसवति, दुक्खं सेति पराजितो
उपसंतो सुखं सेति
, हित्वा जयपराजयं.

हिंदी: विजय वैर को जन्म देती है, पराजित (व्यक्ति) दु:ख (की नींद) सोता है. जिसके (रागद्वेषादी) शांत हो गये हैं व्ह (क्षीणाश्रव) जय और पराजय को छोड़ कर सुख (की नींद) सोता है.

नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि
नत्थि खन्धसमा दुक्खा
, नत्थि सन्तिपरं सुखं.

हिंदी: राग के समान (कोई) आग नहीं, द्वेष के समान (कोई) दुर्भाग्य नहीं, पंचस्कंध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान) के समान (कोई) दु:ख नहीं, शांति (निर्वाण) से बढ़ कर (कोई) सुख नहीं)

जिघच्छापरमा रोगा, सङ्खारपरमा दुखा
एतं ञत्वा यथाभूतं
, निब्बानं परमं सुखं.

हिंदी: भूख (तृष्णा) सबसे बड़ा रोग है. भूख संस्कार सबसे बड़ा दु:ख है. (तृष्णा और उससे बनते संस्कारों को अपने भीतर विपश्यना साधना द्वारा) यथाभूत जानकर जो निर्वाण (प्राप्त होता) है, वह सबसे बड़ा सुख है.

आतोग्यपरमा लाभा, संतुट्टिपरमं धनं
विस्सासपरमा ञाति
, निब्बानं परमं सुखं.

हिंदी: आयोग्य परम लाभ है, संतुष्टि परम धन है, विश्वास परम बंधु है, निर्वाण परम सुख है.

पविवेक रसं पित्वा, रसं उपसमस्स च
निद्दरो होति निप्पापो
, धम्मपीतिरसं पिवं.

हिंदी: पूर्ण एकांत का रस कर और (ऐसे ही) शांति (निर्वाण) का रस-पान कर व्यक्ति निडर होता है और धम्म-प्रीति का रस-पान कर वह निस्पाप हो जाता है.

साहु दस्सनमरियानं, सन्निवासो सदा सुखो
अदस्सनेन बालानं
, निच्चमेव सुखी सिया.

हिंदी: श्रेष्ठ पुरुषों का दर्शन अच्छा होता है, संतों के साथ निवास सदा सुखकर होता है. मूढ़ (पुरुषों) के अदर्शन से सदा सुखी बने रहो.

बालसङ्गतचारी हि, दीघमद्धान सोचति
दुक्खो बालेहि संवासो
, अमित्तेनेव सब्बदा
धीरो च सुखसंवासो
, ञातीनंव समागमो.

हिंदी: मूढ़ (पुरुषों) के साथ संगत करने वाला दीर्घ काल तक शोक ग्रस्त रहता है, मूढ़ों का सहवास शत्रु के समान सदा दु:खदायी होता है, बंधुओं के समागम की भांति ज्ञानियों का सहवास सुखदायी होता है.

तस्मा हि धीरञ्च पञ्ञञ्च बहुस्सुतञ्च, धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं
, भजेथ नक्खत्तपथंव चन्दिमा.

हिंदी: इसलिए धीर, प्रज्ञावान, बहुश्रूत, उद्योगी, व्रती, आर्य – ऐसे सुमेध सत्पुरुष का (एवंविधि) साहचर्य करे जैसे चंद्रमा नक्षत्र-पथ का करता है.


ओडियो सुने


— भवतु सब्ब मंगलं —

Must Read

spot_img