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कोधवग्गो

कोधं जहे विप्पजहेय्य मानं, संयोजनं सब्बमतिक्कमेय्य
तं नामरुपस्मिमसज्जमानं
, अकिञ्चनं नानुपतन्ति दुक्खा.

हिंदी: क्रोध को छोड़ दे, अभिमान का त्याग करे, सारे संयोजनों (बंधनों) को पार कर जाय. ऐसे नामरूप में आसक्त न होने वाले अपरिग्रही को दु:ख संतत नही करते.

यो वे उप्पतितं कोधं, रथं भन्तंव वारये
तमहं सारथिं ब्रूमि
, रस्मिग्गाहो इतरो जनो.

हिंदी: जो भड़के हुए क्रोध को बड़े वेग से घूमते हुए रथ के समान रोक लें, उसे मैं सारथि कहता हूँ, दूसरे लोग तो मात्र लगाम पकड़ने वाले होते हैं.

अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने
जिने कदरियं दानेन
, सच्चेनालिक वादिनं.

हिंदी: अक्रोध से क्रोध को जीते, अभद्र को भद्र बन कर जीते, कृपण को दान से जीते और झूठ बोलने वाले को सत्य से जीते.

सच्चं भणे न कुज्झेय्य, दजा अप्पम्पि याचितो
एतेही तीहि ठानेहि
, गच्छे देवान सन्तिके.

हिंदी: सच बोले, क्रोध न करें, मांगने पर थोड़ा रहते भी दें. इन तीन कारणों से कोई व्यक्ति देवताओं के निकट अर्थात देवलोक में चला जाता है.

अहिंसका ये मुनयो, निच्चं कायेन संवुतो
ते यन्ति अच्चुतं ठानं
, यत्थ गन्त्वा न सोचरे.

हिंदी: जो मुनि अहिंसक हैं और सदा काया में संयत रहते हैं, वे उस अच्युत (शाश्वत) स्थान (निर्वाण) को पा लेते हैं जहाँ पहुँच कर शोक नहीं करते.

सदा जागरमानानं, अहोरत्तानुसिक्खिनं
निब्बानं अधिमुत्तानं
, अत्थं गच्छन्ति आसवा.

हिंदी: जो सदा जागरुक रहते हैं, रात-दिन सीखने में लगे रहते हैं और जिनका ध्येय निर्वाण प्राप्त करना हैं, उसके आश्रव नष्ट हो जाते हैं.

पोराणमेतं अतुल, नेतं अज्जतनामिव
निन्दन्ति तुण्हिमासीनं
, निन्दन्ति बहुभाणिनं
मितभाणिम्पि निन्दन्ति
, नत्थि लोके अनिन्दितो.

हिंदी: ह अतुल! यह पुरानी बात है, आज की नही – लोग चुप बैठे हुए की निंदा करते हैं, बहुत बोलने वाले की निंदा करते हैं, मितभाषी की भी निंदा करते हैं. संसार में अनिंदित कोई नहीं हैं.

न चाहु न च भविस्सति, न चेतरहि विज्जति
एकन्तं निन्दितो पोसो
, एकन्तं वा पसंसेतो.

हिंदी: ऐसा पुरुष जिसकी निंदा ही निदा होती हो, या प्रशंसा ही प्रशंसा, न कभी था, न होगा, इस समय है.

यं चे विञ्ञू पसंसन्ति, अनुविच्च सुवे सुवे
अच्छिद्दवुत्तिं मेधाविं
, पञ्ञासीलसमाहितं.

हिंदी: विज्ञ लोग सोच विचार कर जिस प्रज्ञा वा शील से युक्त, निर्दोष, मेधावी कि दिन-प्रतिदिन प्रशंसा करते हैं.

निक्खं जम्बोनदस्सेव, कोतं निन्दितुमरहति
देवापि नं पसंसन्ति
, ब्रह्मुनापि पसंसितो.

हिंदी: जम्बोनद सोने की अशर्फी के समान उसकी कौन निंदा कर सकता है? देवता भी उसकी प्रशंसा करते हैं, वह ब्रह्मा द्वारा भी प्रशंसित होता है.

कायप्पकोपं रक्खेय्य, कायेन संवुतो सिया
कायदुच्चरितं हित्वा
, कायेन सुचरितं चरे.

हिंदी: कायिकचंचलतआ से बचा रहे, काय से संयत रहे. कायक दुराचार को त्याग कर शरीर से सदाचरण करे.

वचीपकोपं रक्खेय्य, वाचाय संवुतो सिया
वचीदुच्चरितं हित्वा
, वाचाय सुचरितं चरे.

हिंदी: वाचिक चंचलता से बचा रहे, वाणी से संयत रहे. वाचिक दुराचार को त्याग कर वाणी का सदाचरण करें.

मनोपकोपं रक्खेय्य, मनसा संवुतो सिया
मनोदुच्चरितं हित्वा
, मनसा सुचरितं चरे.

हिंदी: मानसिक चंचलता से बचे, मन से संयत रहे. मानसिक दुराचार को त्याग कर मानसिक सदाचरण करें.

कायेन संवुता धीरा, अथो वाचाय संवुता
मनसा संवुता धीरा
, ते वे सुपरिसंवुता.

हिंदी: जो धीर पुरुष काय से संयत हैं, वाणी से संयत हैं, मन से संयत हैं, वे ही पूर्णतया संयत हैं.


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— भवतु सब्ब मंगलं —

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